अध्याय 2, श्लोक 17
अध्याय 2: Sānkhya Yog — सांख्ययोगअविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥
avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati
उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।
समस्त जगत् को जो व्याप्त किये हुये है और इस दृश्यमान अनुभव में आने वाले जगत् का जो अधिष्ठान है वह सत् है। मिट्टी के बने अनेक प्रकार के पात्र होते हैं जिनके विभिन्न उपयोगों के कारण अथवा उनमें रखी वस्तुओं के कारण उनके विभिन्न नाम होते हैं परंतु विविध आकारों के होने पर भी वे सब एक मिट्टी के ही बने होते हैं जो सब आकारों में व्याप्त होती है और जिसके बिना किसी भी पात्र का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। उन सब की उत्पत्ति स्थिति और लय मिट्टी में ही है। अत उनमें मिट्टी ही वास्तव में सत्य है। इसी प्रकार यह नित्य परिवर्तनशील जगत् नित्य अविनाशी तत्त्व से व्याप्त है और भगवान् कहते हैं कि इस तत्त्व का विनाश कदापि सम्भव नहीं है। तब फिर असत् क्या है जिसका अस्तित्व नित्य नहीं है सुनो