ராஜவித்யாராஜகுஹ்யயோக
Bhagavad Gita Chapter 9 in Tamil
Rāja Vidyā Yog · राजविद्या — भक्ति का रहस्य · 34 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।
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ஶ்ரீ பகவாநுவாச இதம் து தே குஹ்யதமம் ப்ரவக்ஷ்யாம்யநஸூயவே। ஜ்ஞாநம் விஜ்ஞாநஸஹிதம் யஜ்ஜ்ஞாத்வா மோக்ஷ்யஸேऽஶுபாத்॥
śhrī bhagavān uvācha idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣhyāmyanasūyave jñānaṁ vijñāna-sahitaṁ yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।
ராஜவித்யா ராஜகுஹ்யம் பவித்ரமிதமுத்தமம்। ப்ரத்யக்ஷாவகமம் தர்ம்யம் ஸுஸுகம் கர்துமவ்யயம்॥
rāja-vidyā rāja-guhyaṁ pavitram idam uttamam pratyakṣhāvagamaṁ dharmyaṁ su-sukhaṁ kartum avyayam
अर्थयह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।
அஶ்ரத்ததாநாஃ புருஷா தர்மஸ்யாஸ்ய பரந்தப। அப்ராப்ய மாம் நிவர்தந்தே ம்ரு'த்யுஸம்ஸாரவர்த்மநி॥
aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani
अर्थहे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।
மயா ததமிதம் ஸர்வம் ஜகதவ்யக்தமூர்திநா। மத்ஸ்தாநி ஸர்வபூதாநி ந சாஹம் தேஷ்வவஸ்திதஃ॥
mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ
अर्थयह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।
ந ச மத்ஸ்தாநி பூதாநி பஶ்ய மே யோகமைஶ்வரம்। பூதப்ரு'ந்ந ச பூதஸ்தோ மமாத்மா பூதபாவநஃ॥
na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ
अर्थऔर (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।
யதாऽऽகாஶஸ்திதோ நித்யம் வாயுஃ ஸர்வத்ரகோ மஹாந்। ததா ஸர்வாணி பூதாநி மத்ஸ்தாநீத்யுபதாரய॥
yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya
अर्थजैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।
ஸர்வபூதாநி கௌந்தேய ப்ரக்ரு'திம் யாந்தி மாமிகாம்। கல்பக்ஷயே புநஸ்தாநி கல்பாதௌ விஸ்ரு'ஜாம்யஹம்॥
sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām kalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham
अर्थहे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।
ப்ரக்ரு'திம் ஸ்வாமவஷ்டப்ய விஸ்ரு'ஜாமி புநஃ புநஃ। பூதக்ராமமிமம் க்ரு'த்ஸ்நமவஶம் ப்ரக்ரு'தேர்வஶாத்॥
prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ bhūta-grāmam imaṁ kṛitsnam avaśhaṁ prakṛiter vaśhāt
अर्थप्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।
ந ச மாம் தாநி கர்மாணி நிபத்நந்தி தநஞ்ஜய। உதாஸீநவதாஸீநமஸக்தம் தேஷு கர்மஸு॥
na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya udāsīna-vad āsīnam asaktaṁ teṣhu karmasu
अर्थहे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ (परमात्मा) को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।
மயாऽத்யக்ஷேண ப்ரக்ரு'திஃ ஸூயதே ஸசராசரம்। ஹேதுநாऽநேந கௌந்தேய ஜகத்விபரிவர்ததே॥
mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam hetunānena kaunteya jagad viparivartate
अर्थहे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण ( अर्थात् मेरी अध्यक्षता में) प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।
அவஜாநந்தி மாம் மூடா மாநுஷீம் தநுமாஶ்ரிதம்। பரம் பாவமஜாநந்தோ மம பூதமஹேஶ்வரம்॥
avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam paraṁ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśhvaram
अर्थसमस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।
மோகாஶா மோககர்மாணோ மோகஜ்ஞாநா விசேதஸஃ। ராக்ஷஸீமாஸுரீம் சைவ ப்ரக்ரு'திம் மோஹிநீம் ஶ்ரிதாஃ॥
moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ
अर्थवृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।
மஹாத்மாநஸ்து மாம் பார்த தைவீம் ப்ரக்ரு'திமாஶ்ரிதாஃ। பஜந்த்யநந்யமநஸோ ஜ்ஞாத்வா பூதாதிமவ்யயம்॥
mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam
अर्थहे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।
ஸததம் கீர்தயந்தோ மாம் யதந்தஶ்ச த்ரு'டவ்ரதாஃ। நமஸ்யந்தஶ்ச மாம் பக்த்யா நித்யயுக்தா உபாஸதே॥
satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ namasyantaśh cha māṁ bhaktyā nitya-yuktā upāsate
अर्थसतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।
ஜ்ஞாநயஜ்ஞேந சாப்யந்யே யஜந்தோ மாமுபாஸதே। ஏகத்வேந ப்ரு'தக்த்வேந பஹுதா விஶ்வதோமுகம்॥
jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate ekatvena pṛithaktvena bahudhā viśhvato-mukham
अर्थकोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।
அஹம் க்ரதுரஹம் யஜ்ஞஃ ஸ்வதாऽஹமஹமௌஷதம்। மம்த்ரோऽஹமஹமேவாஜ்யமஹமக்நிரஹம் ஹுதம்॥
ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam
अर्थमैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।
பிதாऽஹமஸ்ய ஜகதோ மாதா தாதா பிதாமஹஃ। வேத்யம் பவித்ரமோம்கார ரு'க் ஸாம யஜுரேவ ச॥
pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha
अर्थमैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।
கதிர்பர்தா ப்ரபுஃ ஸாக்ஷீ நிவாஸஃ ஶரணம் ஸுஹ்ரு'த்। ப்ரபவஃ ப்ரலயஃ ஸ்தாநம் நிதாநம் பீஜமவ்யயம்॥
gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam
अर्थगति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।
தபாம்யஹமஹம் வர்ஷம் நிக்ரு'ஹ்ணாம்யுத்ஸ்ரு'ஜாமி ச। அம்ரு'தம் சைவ ம்ரு'த்யுஶ்ச ஸதஸச்சாஹமர்ஜுந॥
tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha amṛitaṁ chaiva mṛityuśh cha sad asach chāham arjuna
अर्थहे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।
த்ரைவித்யா மாம் ஸோமபாஃ பூதபாபா யஜ்ஞைரிஷ்ட்வா ஸ்வர்கதிம் ப்ரார்தயந்தே। தே புண்யமாஸாத்ய ஸுரேந்த்ரலோக மஶ்நந்தி திவ்யாந்திவி தேவபோகாந்॥
trai-vidyā māṁ soma-pāḥ pūta-pāpā yajñair iṣhṭvā svar-gatiṁ prārthayante te puṇyam āsādya surendra-lokam aśhnanti divyān divi deva-bhogān
अर्थतीनों वेदों के ज्ञाता (वेदोक्त सकाम कर्म करने वाले), सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।
தே தம் புக்த்வா ஸ்வர்கலோகம் விஶாலம் க்ஷீணே புண்யே மர்த்யலோகம் விஶந்தி। ஏவ த்ரயீதர்மமநுப்ரபந்நா கதாகதம் காமகாமா லபந்தே॥
te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti evaṁ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṁ kāma-kāmā labhante
अर्थवे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।
அநந்யாஶ்சிந்தயந்தோ மாம் யே ஜநாஃ பர்யுபாஸதே। தேஷாம் நித்யாபியுக்தாநாம் யோகக்ஷேமம் வஹாம்யஹம்॥
ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham
अर्थअनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।
யேऽப்யந்யதேவதா பக்தா யஜந்தே ஶ்ரத்தயாऽந்விதாஃ। தேऽபி மாமேவ கௌந்தேய யஜந்த்யவிதிபூர்வகம்॥
ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam
अर्थहे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।
அஹம் ஹி ஸர்வயஜ்ஞாநாம் போக்தா ச ப்ரபுரேவ ச। ந து மாமபிஜாநந்தி தத்த்வேநாதஶ்ச்யவந்தி தே॥
ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te
अर्थक्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।
யாந்தி தேவவ்ரதா தேவாந் பித்ரு'़ந்யாந்தி பித்ரு'வ்ரதாஃ। பூதாநி யாந்தி பூதேஜ்யா யாந்தி மத்யாஜிநோऽபி மாம்॥
yānti deva-vratā devān pitṝīn yānti pitṛi-vratāḥ bhūtāni yānti bhūtejyā yānti mad-yājino ’pi mām
अर्थदेवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
பத்ரம் புஷ்பம் பலம் தோயம் யோ மே பக்த்யா ப்ரயச்சதி। ததஹம் பக்த்யுபஹ்ரு'தமஶ்நாமி ப்ரயதாத்மநஃ॥
patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ
अर्थजो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।
யத்கரோஷி யதஶ்நாஸி யஜ்ஜுஹோஷி ததாஸி யத்। யத்தபஸ்யஸி கௌந்தேய தத்குருஷ்வ மதர்பணம்॥
yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam
अर्थहे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।
ஶுபாஶுபபலைரேவம் மோக்ஷ்யஸே கர்மபந்தநைஃ। ஸம்ந்யாஸயோகயுக்தாத்மா விமுக்தோ மாமுபைஷ்யஸி॥
śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi
अर्थइस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।
ஸமோऽஹம் ஸர்வபூதேஷு ந மே த்வேஷ்யோऽஸ்தி ந ப்ரியஃ। யே பஜந்தி து மாம் பக்த்யா மயி தே தேஷு சாப்யஹம்॥
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
अर्थमैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।
அபி சேத்ஸுதுராசாரோ பஜதே மாமநந்யபாக்। ஸாதுரேவ ஸ மந்தவ்யஃ ஸம்யக்வ்யவஸிதோ ஹி ஸஃ॥
api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ
अर्थयदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।
க்ஷிப்ரம் பவதி தர்மாத்மா ஶஶ்வச்சாந்திம் நிகச்சதி। கௌந்தேய ப்ரதிஜாநீஹி ந மே பக்தஃ ப்ரணஶ்யதி॥
kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati
अर्थहे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।
மாம் ஹி பார்த வ்யபாஶ்ரித்ய யேऽபி ஸ்யுஃ பாபயோநயஃ। ஸ்த்ரியோ வைஶ்யாஸ்ததா ஶூத்ராஸ்தேऽபி யாந்தி பராம் கதிம்॥
māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim
अर्थहे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।
கிம் புநர்ப்ராஹ்மணாஃ புண்யா பக்தா ராஜர்ஷயஸ்ததா। அநித்யமஸுகம் லோகமிமம் ப்ராப்ய பஜஸ்வ மாம்॥
kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām
अर्थफिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।
மந்மநா பவ மத்பக்தோ மத்யாஜீ மாம் நமஸ்குரு। மாமேவைஷ்யஸி யுக்த்வைவமாத்மாநம் மத்பராயணஃ॥
man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣhyasi yuktvaivam ātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ
अर्थ(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।