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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 9 / 18

ਰਾਜਵਿਦ੍ਯਾਰਾਜਗੁਹ੍ਯਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 9 in Punjabi (Gurmukhi)

Rāja Vidyā Yog · राजविद्या — भक्ति का रहस्य · 34 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।

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ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਇਦਂ ਤੁ ਤੇ ਗੁਹ੍ਯਤਮਂ ਪ੍ਰਵਕ੍ष੍ਯਾਮ੍ਯਨਸੂਯਵੇ। ਜ੍ਞਾਨਂ ਵਿਜ੍ਞਾਨਸਹਿਤਂ ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਮੋਕ੍ष੍ਯਸੇऽਸ਼ੁਭਾਤ੍॥

śhrī bhagavān uvācha idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣhyāmyanasūyave jñānaṁ vijñāna-sahitaṁ yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।

ਰਾਜਵਿਦ੍ਯਾ ਰਾਜਗੁਹ੍ਯਂ ਪਵਿਤ੍ਰਮਿਦਮੁਤ੍ਤਮਮ੍। ਪ੍ਰਤ੍ਯਕ੍षਾਵਗਮਂ ਧਰ੍ਮ੍ਯਂ ਸੁਸੁਖਂ ਕਰ੍ਤੁਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

rāja-vidyā rāja-guhyaṁ pavitram idam uttamam pratyakṣhāvagamaṁ dharmyaṁ su-sukhaṁ kartum avyayam

अर्थयह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।

ਅਸ਼੍ਰਦ੍ਦਧਾਨਾਃ ਪੁਰੁषਾ ਧਰ੍ਮਸ੍ਯਾਸ੍ਯ ਪਰਨ੍ਤਪ। ਅਪ੍ਰਾਪ੍ਯ ਮਾਂ ਨਿਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਮृਤ੍ਯੁਸਂਸਾਰਵਰ੍ਤ੍ਮਨਿ॥

aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani

अर्थहे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।

ਮਯਾ ਤਤਮਿਦਂ ਸਰ੍ਵਂ ਜਗਦਵ੍ਯਕ੍ਤਮੂਰ੍ਤਿਨਾ। ਮਤ੍ਸ੍ਥਾਨਿ ਸਰ੍ਵਭੂਤਾਨਿ ਚਾਹਂ ਤੇष੍ਵਵਸ੍ਥਿਤਃ॥

mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ

अर्थयह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।

ਮਤ੍ਸ੍ਥਾਨਿ ਭੂਤਾਨਿ ਪਸ਼੍ਯ ਮੇ ਯੋਗਮੈਸ਼੍ਵਰਮ੍। ਭੂਤਭृਨ੍ਨ ਭੂਤਸ੍ਥੋ ਮਮਾਤ੍ਮਾ ਭੂਤਭਾਵਨਃ॥

na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ

अर्थऔर (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।

ਯਥਾऽऽਕਾਸ਼ਸ੍ਥਿਤੋ ਨਿਤ੍ਯਂ ਵਾਯੁਃ ਸਰ੍ਵਤ੍ਰਗੋ ਮਹਾਨ੍। ਤਥਾ ਸਰ੍ਵਾਣਿ ਭੂਤਾਨਿ ਮਤ੍ਸ੍ਥਾਨੀਤ੍ਯੁਪਧਾਰਯ॥

yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya

अर्थजैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।

ਸਰ੍ਵਭੂਤਾਨਿ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਯਾਨ੍ਤਿ ਮਾਮਿਕਾਮ੍। ਕਲ੍ਪਕ੍षਯੇ ਪੁਨਸ੍ਤਾਨਿ ਕਲ੍ਪਾਦੌ ਵਿਸृਜਾਮ੍ਯਹਮ੍॥

sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām kalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham

अर्थहे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।

ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਸ੍ਵਾਮਵष੍ਟਭ੍ਯ ਵਿਸृਜਾਮਿ ਪੁਨਃ ਪੁਨਃ। ਭੂਤਗ੍ਰਾਮਮਿਮਂ ਕृਤ੍ਸ੍ਨਮਵਸ਼ਂ ਪ੍ਰਕृਤੇਰ੍ਵਸ਼ਾਤ੍॥

prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ bhūta-grāmam imaṁ kṛitsnam avaśhaṁ prakṛiter vaśhāt

अर्थप्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।

ਮਾਂ ਤਾਨਿ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਨਿਬਧ੍ਨਨ੍ਤਿ ਧਨਞ੍ਜਯ। ਉਦਾਸੀਨਵਦਾਸੀਨਮਸਕ੍ਤਂ ਤੇषੁ ਕਰ੍ਮਸੁ॥

na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya udāsīna-vad āsīnam asaktaṁ teṣhu karmasu

अर्थहे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ (परमात्मा) को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।

ਮਯਾऽਧ੍ਯਕ੍षੇਣ ਪ੍ਰਕृਤਿਃ ਸੂਯਤੇ ਸਚਰਾਚਰਮ੍। ਹੇਤੁਨਾऽਨੇਨ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਜਗਦ੍ਵਿਪਰਿਵਰ੍ਤਤੇ॥

mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam hetunānena kaunteya jagad viparivartate

अर्थहे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण ( अर्थात् मेरी अध्यक्षता में) प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।

ਅਵਜਾਨਨ੍ਤਿ ਮਾਂ ਮੂਢਾ ਮਾਨੁषੀਂ ਤਨੁਮਾਸ਼੍ਰਿਤਮ੍। ਪਰਂ ਭਾਵਮਜਾਨਨ੍ਤੋ ਮਮ ਭੂਤਮਹੇਸ਼੍ਵਰਮ੍॥

avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam paraṁ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśhvaram

अर्थसमस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।

ਮੋਘਾਸ਼ਾ ਮੋਘਕਰ੍ਮਾਣੋ ਮੋਘਜ੍ਞਾਨਾ ਵਿਚੇਤਸਃ। ਰਾਕ੍षਸੀਮਾਸੁਰੀਂ ਚੈਵ ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਮੋਹਿਨੀਂ ਸ਼੍ਰਿਤਾਃ॥

moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ

अर्थवृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।

ਮਹਾਤ੍ਮਾਨਸ੍ਤੁ ਮਾਂ ਪਾਰ੍ਥ ਦੈਵੀਂ ਪ੍ਰਕृਤਿਮਾਸ਼੍ਰਿਤਾਃ। ਭਜਨ੍ਤ੍ਯਨਨ੍ਯਮਨਸੋ ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਭੂਤਾਦਿਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam

अर्थहे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।

ਸਤਤਂ ਕੀਰ੍ਤਯਨ੍ਤੋ ਮਾਂ ਯਤਨ੍ਤਸ਼੍ਚ ਦृਢਵ੍ਰਤਾਃ। ਨਮਸ੍ਯਨ੍ਤਸ਼੍ਚ ਮਾਂ ਭਕ੍ਤ੍ਯਾ ਨਿਤ੍ਯਯੁਕ੍ਤਾ ਉਪਾਸਤੇ॥

satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ namasyantaśh cha māṁ bhaktyā nitya-yuktā upāsate

अर्थसतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।

ਜ੍ਞਾਨਯਜ੍ਞੇਨ ਚਾਪ੍ਯਨ੍ਯੇ ਯਜਨ੍ਤੋ ਮਾਮੁਪਾਸਤੇ। ਏਕਤ੍ਵੇਨ ਪृਥਕ੍ਤ੍ਵੇਨ ਬਹੁਧਾ ਵਿਸ਼੍ਵਤੋਮੁਖਮ੍॥

jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate ekatvena pṛithaktvena bahudhā viśhvato-mukham

अर्थकोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।

ਅਹਂ ਕ੍ਰਤੁਰਹਂ ਯਜ੍ਞਃ ਸ੍ਵਧਾऽਹਮਹਮੌषਧਮ੍। ਮਂਤ੍ਰੋऽਹਮਹਮੇਵਾਜ੍ਯਮਹਮਗ੍ਨਿਰਹਂ ਹੁਤਮ੍॥

ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam

अर्थमैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।

ਪਿਤਾऽਹਮਸ੍ਯ ਜਗਤੋ ਮਾਤਾ ਧਾਤਾ ਪਿਤਾਮਹਃ। ਵੇਦ੍ਯਂ ਪਵਿਤ੍ਰਮੋਂਕਾਰ ऋਕ੍ ਸਾਮ ਯਜੁਰੇਵ ਚ॥

pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha

अर्थमैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।

ਗਤਿਰ੍ਭਰ੍ਤਾ ਪ੍ਰਭੁਃ ਸਾਕ੍षੀ ਨਿਵਾਸਃ ਸ਼ਰਣਂ ਸੁਹृਤ੍। ਪ੍ਰਭਵਃ ਪ੍ਰਲਯਃ ਸ੍ਥਾਨਂ ਨਿਧਾਨਂ ਬੀਜਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam

अर्थगति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।

ਤਪਾਮ੍ਯਹਮਹਂ ਵਰ੍षਂ ਨਿਗृਹ੍ਣਾਮ੍ਯੁਤ੍ਸृਜਾਮਿ ਚ। ਅਮृਤਂ ਚੈਵ ਮृਤ੍ਯੁਸ਼੍ਚ ਸਦਸਚ੍ਚਾਹਮਰ੍ਜੁਨ॥

tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha amṛitaṁ chaiva mṛityuśh cha sad asach chāham arjuna

अर्थहे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।

ਤ੍ਰੈਵਿਦ੍ਯਾ ਮਾਂ ਸੋਮਪਾਃ ਪੂਤਪਾਪਾ ਯਜ੍ਞੈਰਿष੍ਟ੍ਵਾ ਸ੍ਵਰ੍ਗਤਿਂ ਪ੍ਰਾਰ੍ਥਯਨ੍ਤੇ। ਤੇ ਪੁਣ੍ਯਮਾਸਾਦ੍ਯ ਸੁਰੇਨ੍ਦ੍ਰਲੋਕ ਮਸ਼੍ਨਨ੍ਤਿ ਦਿਵ੍ਯਾਨ੍ਦਿਵਿ ਦੇਵਭੋਗਾਨ੍॥

trai-vidyā māṁ soma-pāḥ pūta-pāpā yajñair iṣhṭvā svar-gatiṁ prārthayante te puṇyam āsādya surendra-lokam aśhnanti divyān divi deva-bhogān

अर्थतीनों वेदों के ज्ञाता (वेदोक्त सकाम कर्म करने वाले), सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।

ਤੇ ਤਂ ਭੁਕ੍ਤ੍ਵਾ ਸ੍ਵਰ੍ਗਲੋਕਂ ਵਿਸ਼ਾਲਂ ਕ੍षੀਣੇ ਪੁਣ੍ਯੇ ਮਰ੍ਤ੍ਯਲੋਕਂ ਵਿਸ਼ਨ੍ਤਿ। ਏਵ ਤ੍ਰਯੀਧਰ੍ਮਮਨੁਪ੍ਰਪਨ੍ਨਾ ਗਤਾਗਤਂ ਕਾਮਕਾਮਾ ਲਭਨ੍ਤੇ॥

te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti evaṁ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṁ kāma-kāmā labhante

अर्थवे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।

ਅਨਨ੍ਯਾਸ਼੍ਚਿਨ੍ਤਯਨ੍ਤੋ ਮਾਂ ਯੇ ਜਨਾਃ ਪਰ੍ਯੁਪਾਸਤੇ। ਤੇषਾਂ ਨਿਤ੍ਯਾਭਿਯੁਕ੍ਤਾਨਾਂ ਯੋਗਕ੍षੇਮਂ ਵਹਾਮ੍ਯਹਮ੍॥

ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

अर्थअनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

ਯੇऽਪ੍ਯਨ੍ਯਦੇਵਤਾ ਭਕ੍ਤਾ ਯਜਨ੍ਤੇ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਯਾऽਨ੍ਵਿਤਾਃ। ਤੇऽਪਿ ਮਾਮੇਵ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਯਜਨ੍ਤ੍ਯਵਿਧਿਪੂਰ੍ਵਕਮ੍॥

ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam

अर्थहे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।

ਅਹਂ ਹਿ ਸਰ੍ਵਯਜ੍ਞਾਨਾਂ ਭੋਕ੍ਤਾ ਪ੍ਰਭੁਰੇਵ ਚ। ਤੁ ਮਾਮਭਿਜਾਨਨ੍ਤਿ ਤਤ੍ਤ੍ਵੇਨਾਤਸ਼੍ਚ੍ਯਵਨ੍ਤਿ ਤੇ॥

ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te

अर्थक्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।

ਯਾਨ੍ਤਿ ਦੇਵਵ੍ਰਤਾ ਦੇਵਾਨ੍ ਪਿਤृ़ਨ੍ਯਾਨ੍ਤਿ ਪਿਤृਵ੍ਰਤਾਃ। ਭੂਤਾਨਿ ਯਾਨ੍ਤਿ ਭੂਤੇਜ੍ਯਾ ਯਾਨ੍ਤਿ ਮਦ੍ਯਾਜਿਨੋऽਪਿ ਮਾਮ੍॥

yānti deva-vratā devān pitṝīn yānti pitṛi-vratāḥ bhūtāni yānti bhūtejyā yānti mad-yājino ’pi mām

अर्थदेवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

ਪਤ੍ਰਂ ਪੁष੍ਪਂ ਫਲਂ ਤੋਯਂ ਯੋ ਮੇ ਭਕ੍ਤ੍ਯਾ ਪ੍ਰਯਚ੍ਛਤਿ। ਤਦਹਂ ਭਕ੍ਤ੍ਯੁਪਹृਤਮਸ਼੍ਨਾਮਿ ਪ੍ਰਯਤਾਤ੍ਮਨਃ॥

patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ

अर्थजो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।

ਯਤ੍ਕਰੋषਿ ਯਦਸ਼੍ਨਾਸਿ ਯਜ੍ਜੁਹੋषਿ ਦਦਾਸਿ ਯਤ੍। ਯਤ੍ਤਪਸ੍ਯਸਿ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਤਤ੍ਕੁਰੁष੍ਵ ਮਦਰ੍ਪਣਮ੍॥

yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam

अर्थहे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।

ਸ਼ੁਭਾਸ਼ੁਭਫਲੈਰੇਵਂ ਮੋਕ੍ष੍ਯਸੇ ਕਰ੍ਮਬਨ੍ਧਨੈਃ। ਸਂਨ੍ਯਾਸਯੋਗਯੁਕ੍ਤਾਤ੍ਮਾ ਵਿਮੁਕ੍ਤੋ ਮਾਮੁਪੈष੍ਯਸਿ॥

śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi

अर्थइस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।

ਸਮੋऽਹਂ ਸਰ੍ਵਭੂਤੇषੁ ਮੇ ਦ੍ਵੇष੍ਯੋऽਸ੍ਤਿ ਪ੍ਰਿਯਃ। ਯੇ ਭਜਨ੍ਤਿ ਤੁ ਮਾਂ ਭਕ੍ਤ੍ਯਾ ਮਯਿ ਤੇ ਤੇषੁ ਚਾਪ੍ਯਹਮ੍॥

samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham

अर्थमैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।

ਅਪਿ ਚੇਤ੍ਸੁਦੁਰਾਚਾਰੋ ਭਜਤੇ ਮਾਮਨਨ੍ਯਭਾਕ੍। ਸਾਧੁਰੇਵ ਮਨ੍ਤਵ੍ਯਃ ਸਮ੍ਯਗ੍ਵ੍ਯਵਸਿਤੋ ਹਿ ਸਃ॥

api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

अर्थयदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।

ਕ੍षਿਪ੍ਰਂ ਭਵਤਿ ਧਰ੍ਮਾਤ੍ਮਾ ਸ਼ਸ਼੍ਵਚ੍ਛਾਨ੍ਤਿਂ ਨਿਗਚ੍ਛਤਿ। ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਪ੍ਰਤਿਜਾਨੀਹਿ ਮੇ ਭਕ੍ਤਃ ਪ੍ਰਣਸ਼੍ਯਤਿ॥

kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

अर्थहे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।

ਮਾਂ ਹਿ ਪਾਰ੍ਥ ਵ੍ਯਪਾਸ਼੍ਰਿਤ੍ਯ ਯੇऽਪਿ ਸ੍ਯੁਃ ਪਾਪਯੋਨਯਃ। ਸ੍ਤ੍ਰਿਯੋ ਵੈਸ਼੍ਯਾਸ੍ਤਥਾ ਸ਼ੂਦ੍ਰਾਸ੍ਤੇऽਪਿ ਯਾਨ੍ਤਿ ਪਰਾਂ ਗਤਿਮ੍॥

māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim

अर्थहे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।

ਕਿਂ ਪੁਨਰ੍ਬ੍ਰਾਹ੍ਮਣਾਃ ਪੁਣ੍ਯਾ ਭਕ੍ਤਾ ਰਾਜਰ੍षਯਸ੍ਤਥਾ। ਅਨਿਤ੍ਯਮਸੁਖਂ ਲੋਕਮਿਮਂ ਪ੍ਰਾਪ੍ਯ ਭਜਸ੍ਵ ਮਾਮ੍॥

kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām

अर्थफिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।

ਮਨ੍ਮਨਾ ਭਵ ਮਦ੍ਭਕ੍ਤੋ ਮਦ੍ਯਾਜੀ ਮਾਂ ਨਮਸ੍ਕੁਰੁ। ਮਾਮੇਵੈष੍ਯਸਿ ਯੁਕ੍ਤ੍ਵੈਵਮਾਤ੍ਮਾਨਂ ਮਤ੍ਪਰਾਯਣਃ॥

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣhyasi yuktvaivam ātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ

अर्थ(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।