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ഭഗവദ്ഗീതാ · അധ്യായ 9 / 18

രാജവിദ്യാരാജഗുഹ്യയോഗ

Bhagavad Gita Chapter 9 in Malayalam

Rāja Vidyā Yog · राजविद्या — भक्ति का रहस्य · 34 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।

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ശ്രീ ഭഗവാനുവാച ഇദം തു തേ ഗുഹ്യതമം പ്രവക്ഷ്യാമ്യനസൂയവേ। ജ്ഞാനം വിജ്ഞാനസഹിതം യജ്ജ്ഞാത്വാ മോക്ഷ്യസേഽശുഭാത്॥

śhrī bhagavān uvācha idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣhyāmyanasūyave jñānaṁ vijñāna-sahitaṁ yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।

രാജവിദ്യാ രാജഗുഹ്യം പവിത്രമിദമുത്തമമ്। പ്രത്യക്ഷാവഗമം ധര്മ്യം സുസുഖം കര്തുമവ്യയമ്॥

rāja-vidyā rāja-guhyaṁ pavitram idam uttamam pratyakṣhāvagamaṁ dharmyaṁ su-sukhaṁ kartum avyayam

अर्थयह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।

അശ്രദ്ദധാനാഃ പുരുഷാ ധര്മസ്യാസ്യ പരന്തപ। അപ്രാപ്യ മാം നിവര്തന്തേ മൃത്യുസംസാരവര്ത്മനി॥

aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani

अर्थहे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।

മയാ തതമിദം സര്വം ജഗദവ്യക്തമൂര്തിനാ। മത്സ്ഥാനി സര്വഭൂതാനി ചാഹം തേഷ്വവസ്ഥിതഃ॥

mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ

अर्थयह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।

മത്സ്ഥാനി ഭൂതാനി പശ്യ മേ യോഗമൈശ്വരമ്। ഭൂതഭൃന്ന ഭൂതസ്ഥോ മമാത്മാ ഭൂതഭാവനഃ॥

na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ

अर्थऔर (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।

യഥാഽഽകാശസ്ഥിതോ നിത്യം വായുഃ സര്വത്രഗോ മഹാന്। തഥാ സര്വാണി ഭൂതാനി മത്സ്ഥാനീത്യുപധാരയ॥

yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya

अर्थजैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।

സര്വഭൂതാനി കൌന്തേയ പ്രകൃതിം യാന്തി മാമികാമ്। കല്പക്ഷയേ പുനസ്താനി കല്പാദൌ വിസൃജാമ്യഹമ്॥

sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām kalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham

अर्थहे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।

പ്രകൃതിം സ്വാമവഷ്ടഭ്യ വിസൃജാമി പുനഃ പുനഃ। ഭൂതഗ്രാമമിമം കൃത്സ്നമവശം പ്രകൃതേര്വശാത്॥

prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ bhūta-grāmam imaṁ kṛitsnam avaśhaṁ prakṛiter vaśhāt

अर्थप्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।

മാം താനി കര്മാണി നിബധ്നന്തി ധനഞ്ജയ। ഉദാസീനവദാസീനമസക്തം തേഷു കര്മസു॥

na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya udāsīna-vad āsīnam asaktaṁ teṣhu karmasu

अर्थहे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ (परमात्मा) को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।

മയാഽധ്യക്ഷേണ പ്രകൃതിഃ സൂയതേ സചരാചരമ്। ഹേതുനാഽനേന കൌന്തേയ ജഗദ്വിപരിവര്തതേ॥

mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam hetunānena kaunteya jagad viparivartate

अर्थहे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण ( अर्थात् मेरी अध्यक्षता में) प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।

അവജാനന്തി മാം മൂഢാ മാനുഷീം തനുമാശ്രിതമ്। പരം ഭാവമജാനന്തോ മമ ഭൂതമഹേശ്വരമ്॥

avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam paraṁ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśhvaram

अर्थसमस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।

മോഘാശാ മോഘകര്മാണോ മോഘജ്ഞാനാ വിചേതസഃ। രാക്ഷസീമാസുരീം ചൈവ പ്രകൃതിം മോഹിനീം ശ്രിതാഃ॥

moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ

अर्थवृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।

മഹാത്മാനസ്തു മാം പാര്ഥ ദൈവീം പ്രകൃതിമാശ്രിതാഃ। ഭജന്ത്യനന്യമനസോ ജ്ഞാത്വാ ഭൂതാദിമവ്യയമ്॥

mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam

अर्थहे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।

സതതം കീര്തയന്തോ മാം യതന്തശ്ച ദൃഢവ്രതാഃ। നമസ്യന്തശ്ച മാം ഭക്ത്യാ നിത്യയുക്താ ഉപാസതേ॥

satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ namasyantaśh cha māṁ bhaktyā nitya-yuktā upāsate

अर्थसतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।

ജ്ഞാനയജ്ഞേന ചാപ്യന്യേ യജന്തോ മാമുപാസതേ। ഏകത്വേന പൃഥക്ത്വേന ബഹുധാ വിശ്വതോമുഖമ്॥

jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate ekatvena pṛithaktvena bahudhā viśhvato-mukham

अर्थकोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।

അഹം ക്രതുരഹം യജ്ഞഃ സ്വധാഽഹമഹമൌഷധമ്। മംത്രോഽഹമഹമേവാജ്യമഹമഗ്നിരഹം ഹുതമ്॥

ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam

अर्थमैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।

പിതാഽഹമസ്യ ജഗതോ മാതാ ധാതാ പിതാമഹഃ। വേദ്യം പവിത്രമോംകാര ഋക് സാമ യജുരേവ ച॥

pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha

अर्थमैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।

ഗതിര്ഭര്താ പ്രഭുഃ സാക്ഷീ നിവാസഃ ശരണം സുഹൃത്। പ്രഭവഃ പ്രലയഃ സ്ഥാനം നിധാനം ബീജമവ്യയമ്॥

gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam

अर्थगति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।

തപാമ്യഹമഹം വര്ഷം നിഗൃഹ്ണാമ്യുത്സൃജാമി ച। അമൃതം ചൈവ മൃത്യുശ്ച സദസച്ചാഹമര്ജുന॥

tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha amṛitaṁ chaiva mṛityuśh cha sad asach chāham arjuna

अर्थहे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।

ത്രൈവിദ്യാ മാം സോമപാഃ പൂതപാപാ യജ്ഞൈരിഷ്ട്വാ സ്വര്ഗതിം പ്രാര്ഥയന്തേ। തേ പുണ്യമാസാദ്യ സുരേന്ദ്രലോക മശ്നന്തി ദിവ്യാന്ദിവി ദേവഭോഗാന്॥

trai-vidyā māṁ soma-pāḥ pūta-pāpā yajñair iṣhṭvā svar-gatiṁ prārthayante te puṇyam āsādya surendra-lokam aśhnanti divyān divi deva-bhogān

अर्थतीनों वेदों के ज्ञाता (वेदोक्त सकाम कर्म करने वाले), सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।

തേ തം ഭുക്ത്വാ സ്വര്ഗലോകം വിശാലം ക്ഷീണേ പുണ്യേ മര്ത്യലോകം വിശന്തി। ഏവ ത്രയീധര്മമനുപ്രപന്നാ ഗതാഗതം കാമകാമാ ലഭന്തേ॥

te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti evaṁ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṁ kāma-kāmā labhante

अर्थवे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।

അനന്യാശ്ചിന്തയന്തോ മാം യേ ജനാഃ പര്യുപാസതേ। തേഷാം നിത്യാഭിയുക്താനാം യോഗക്ഷേമം വഹാമ്യഹമ്॥

ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

अर्थअनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

യേഽപ്യന്യദേവതാ ഭക്താ യജന്തേ ശ്രദ്ധയാഽന്വിതാഃ। തേഽപി മാമേവ കൌന്തേയ യജന്ത്യവിധിപൂര്വകമ്॥

ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam

अर्थहे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।

അഹം ഹി സര്വയജ്ഞാനാം ഭോക്താ പ്രഭുരേവ ച। തു മാമഭിജാനന്തി തത്ത്വേനാതശ്ച്യവന്തി തേ॥

ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te

अर्थक्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।

യാന്തി ദേവവ്രതാ ദേവാന് പിതൃ़ന്യാന്തി പിതൃവ്രതാഃ। ഭൂതാനി യാന്തി ഭൂതേജ്യാ യാന്തി മദ്യാജിനോഽപി മാമ്॥

yānti deva-vratā devān pitṝīn yānti pitṛi-vratāḥ bhūtāni yānti bhūtejyā yānti mad-yājino ’pi mām

अर्थदेवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

പത്രം പുഷ്പം ഫലം തോയം യോ മേ ഭക്ത്യാ പ്രയച്ഛതി। തദഹം ഭക്ത്യുപഹൃതമശ്നാമി പ്രയതാത്മനഃ॥

patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ

अर्थजो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।

യത്കരോഷി യദശ്നാസി യജ്ജുഹോഷി ദദാസി യത്। യത്തപസ്യസി കൌന്തേയ തത്കുരുഷ്വ മദര്പണമ്॥

yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam

अर्थहे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।

ശുഭാശുഭഫലൈരേവം മോക്ഷ്യസേ കര്മബന്ധനൈഃ। സംന്യാസയോഗയുക്താത്മാ വിമുക്തോ മാമുപൈഷ്യസി॥

śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi

अर्थइस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।

സമോഽഹം സര്വഭൂതേഷു മേ ദ്വേഷ്യോഽസ്തി പ്രിയഃ। യേ ഭജന്തി തു മാം ഭക്ത്യാ മയി തേ തേഷു ചാപ്യഹമ്॥

samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham

अर्थमैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।

അപി ചേത്സുദുരാചാരോ ഭജതേ മാമനന്യഭാക്। സാധുരേവ മന്തവ്യഃ സമ്യഗ്വ്യവസിതോ ഹി സഃ॥

api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

अर्थयदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।

ക്ഷിപ്രം ഭവതി ധര്മാത്മാ ശശ്വച്ഛാന്തിം നിഗച്ഛതി। കൌന്തേയ പ്രതിജാനീഹി മേ ഭക്തഃ പ്രണശ്യതി॥

kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

अर्थहे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।

മാം ഹി പാര്ഥ വ്യപാശ്രിത്യ യേഽപി സ്യുഃ പാപയോനയഃ। സ്ത്രിയോ വൈശ്യാസ്തഥാ ശൂദ്രാസ്തേഽപി യാന്തി പരാം ഗതിമ്॥

māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim

अर्थहे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।

കിം പുനര്ബ്രാഹ്മണാഃ പുണ്യാ ഭക്താ രാജര്ഷയസ്തഥാ। അനിത്യമസുഖം ലോകമിമം പ്രാപ്യ ഭജസ്വ മാമ്॥

kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām

अर्थफिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।

മന്മനാ ഭവ മദ്ഭക്തോ മദ്യാജീ മാം നമസ്കുരു। മാമേവൈഷ്യസി യുക്ത്വൈവമാത്മാനം മത്പരായണഃ॥

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣhyasi yuktvaivam ātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ

अर्थ(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।