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सुंदरकांड

दोहा 56 / 60

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Chaupāī

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं गाई॥ सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥ तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥ सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥ मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥ सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥ सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥ रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥ बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥

rāma teja bala budhi bipulāī seṣa sahasa sata sakahiṃ na gāī saka sara eka soṣi sata sāgara taba bhrātahi pū~cheu naya nāgara tāsu bacana suni sāgara pāhīṃ māgata paṃtha kṛpā mana māhīṃ sunata bacana bihasā dasasīsā jauṃ asi mati sahāya kṛta kīsā sahaja bhīru kara bacana dṛḍhāī sāgara sana ṭhānī macalāī mūḍha mṛṣā kā karasi baḍāī ripu bala buddhi thāha maiṃ pāī saciva sabhīta bibhīṣana jākeṃ bijaya bibhūti kahā~ jaga tākeṃ suni khala bacana dūta risa bāḍhī samaya bicāri patrikā kāḍhī rāmānuja dīnhī yaha pātī nātha bacāi juḍāvahu chātī bihasi bāma kara līnhī rāvana saciva boli saṭha lāga bacāvana

Dohā

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥56(क)॥ की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥56(ख)॥

bātanha manahi rijhāi saṭha jani ghālasi kula khīsa rāma birodha na ubarasi sarana biṣnu aja īsa 56(ka) kī taji māna anuja iva prabhu pada paṃkaja bhṛṃga hohi ki rāma sarānala khala kula sahita pataṃga 56(kha)

अर्थ"राम का तेज, बल और बुद्धि की विपुलता — सौ हज़ार शेष भी नहीं गा सकते। एक बाण से सौ समुद्र सोख सकते हैं; फिर भी नीति-निपुण ने भाई से पूछा। उनके (विभीषण के) वचन सुनकर वे समुद्र से मार्ग माँगते हैं, मन में दया लिए।" यह सुनकर दशानन हँसा: "यदि ऐसी मति है, और वानर को सहायक बनाया! सहज भीरु (विभीषण) के वचन दृढ़ कर उसने समुद्र से मचलाहट ठानी। रे मूढ़! झूठी बड़ाई क्यों करता है? मैंने शत्रु के बल-बुद्धि की थाह पा ली। जिसका मंत्री विभीषण भयभीत हो, उसके लिए जगत् में विजय-विभूति कहाँ?" खल के वचन सुनकर दूत का रोष बढ़ा; समय विचारकर पत्रिका निकाली: "राम के अनुज ने यह पत्र दिया; हे नाथ! इसे बँचवाकर छाती जुड़ाइए।" हँसकर रावण ने बाएँ हाथ में लिया और मंत्री को बुलाकर मूढ़ बँचवाने लगा। "रे मूढ़! बातों से अपने को रिझाकर कुल का नाश मत कर; राम-विरोध में तू नहीं बचेगा, विष्णु-ब्रह्मा-शिव की शरण लेकर भी। या तो मान त्यागकर अनुज (विभीषण) की भाँति प्रभु के चरण-कमलों का भृंग बन; या रे खल! कुल सहित राम के बाण-रूपी अग्नि का पतंगा बन।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 56 का अर्थ क्या है?
"राम का तेज, बल और बुद्धि की विपुलता — सौ हज़ार शेष भी नहीं गा सकते। एक बाण से सौ समुद्र सोख सकते हैं; फिर भी नीति-निपुण ने भाई से पूछा। उनके (विभीषण के) वचन सुनकर वे समुद्र से मार्ग माँगते हैं, मन में दया लिए।" यह सुनकर दशानन हँसा: "यदि ऐसी मति है, और वानर को सहायक बनाया! सहज भीरु (विभीषण) के वचन दृढ़ कर उसने समुद्र से मचलाहट ठानी। रे मूढ़! झूठी बड़ाई क्यों करता है? मैंने शत्रु के बल-बुद्धि की थाह पा ली। जिसका मंत्री विभीषण भयभीत हो, उसके लिए जगत् में विजय-विभूति कहाँ?" खल के वचन सुनकर दूत का रोष बढ़ा; समय विचारकर पत्रिका निकाली: "राम के अनुज ने यह पत्र दिया; हे नाथ! इसे बँचवाकर छाती जुड़ाइए।" हँसकर रावण ने बाएँ हाथ में लिया और मंत्री को बुलाकर मूढ़ बँचवाने लगा। "रे मूढ़! बातों से अपने को रिझाकर कुल का नाश मत कर; राम-विरोध में तू नहीं बचेगा, विष्णु-ब्रह्मा-शिव की शरण लेकर भी। या तो मान त्यागकर अनुज (विभीषण) की भाँति प्रभु के चरण-कमलों का भृंग बन; या रे खल! कुल सहित राम के बाण-रूपी अग्नि का पतंगा बन।"