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सुंदरकांड

दोहा 57 / 60

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Chaupāī

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥ भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥ कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥ सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥ अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥ मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध एकउ धरिही॥ जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे। जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥ नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥ रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥ बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

sunata sabhaya mana mukha musukāī kahata dasānana sabahi sunāī bhūmi parā kara gahata akāsā laghu tāpasa kara bāga bilāsā kaha suka nātha satya saba bānī samujhahu chāḍi prakṛti abhimānī sunahu bacana mama parihari krodhā nātha rāma sana tajahu birodhā ati komala raghubīra subhāū jadyapi akhila loka kara rāū milata kṛpā tumha para prabhu karihī ura aparādha na ekau dharihī janakasutā raghunāthahi dīje etanā kahā mora prabhu kīje jaba tehiṃ kahā dena baidehī carana prahāra kīnha saṭha tehī nāi carana siru calā so tahā~ kṛpāsiṃdhu raghunāyaka jahā~ kari pranāmu nija kathā sunāī rāma kṛpā~ āpani gati pāī riṣi agasti kīṃ sāpa bhavānī rāchasa bhayau rahā muni gyānī baṃdi rāma pada bārahiṃ bārā muni nija āśrama kahu~ pagu dhārā

Dohā

बिनय मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ प्रीति॥57॥

binaya na mānata jaladhi jaḍa gae tīna dina bīti bole rāma sakopa taba bhaya binu hoi na prīti 57

अर्थसुनकर मन में भयभीत (पर) मुख से मुस्कुराते हुए दशानन ने सबको सुनाकर कहा: "भूमि पर पड़ा आकाश को पकड़ता है — यह छोटे तपस्वी की बाग-विलास (नटखटी) है!" शुक बोला, "हे नाथ! सब वाणी सत्य है; अभिमानी प्रकृति छोड़कर समझिए। क्रोध त्यागकर मेरे वचन सुनिए; हे नाथ! राम से विरोध छोड़िए। रघुवीर का स्वभाव अति कोमल है, यद्यपि वे अखिल लोक के राजा हैं; मिलते ही वे आप पर कृपा करेंगे, और हृदय में एक भी अपराध न धरेंगे। जानकी जी रघुनाथ को दे दीजिए; हे नाथ! मेरा इतना कहा कीजिए।" जब उसने वैदेही देने को कहा, तो मूढ़ ने उसे लात मारी। (रावण के) चरणों में सिर नवाकर वह वहाँ गया जहाँ कृपासिंधु रघुनाथ थे; प्रणाम कर अपनी कथा सुनाई, और राम की कृपा से अपनी गति (रूप) पाई। हे भवानी! ऋषि अगस्त्य के शाप से वह राक्षस हुआ था — (वस्तुतः) ज्ञानी मुनि; बार-बार राम के चरण वंदन कर मुनि अपने आश्रम को चले। (इधर) जड़ समुद्र विनय न माने; तीन दिन बीत गए; तब राम सक्रोध बोले — भय बिना प्रीति (अनुपालन) नहीं होती।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 57 का अर्थ क्या है?
सुनकर मन में भयभीत (पर) मुख से मुस्कुराते हुए दशानन ने सबको सुनाकर कहा: "भूमि पर पड़ा आकाश को पकड़ता है — यह छोटे तपस्वी की बाग-विलास (नटखटी) है!" शुक बोला, "हे नाथ! सब वाणी सत्य है; अभिमानी प्रकृति छोड़कर समझिए। क्रोध त्यागकर मेरे वचन सुनिए; हे नाथ! राम से विरोध छोड़िए। रघुवीर का स्वभाव अति कोमल है, यद्यपि वे अखिल लोक के राजा हैं; मिलते ही वे आप पर कृपा करेंगे, और हृदय में एक भी अपराध न धरेंगे। जानकी जी रघुनाथ को दे दीजिए; हे नाथ! मेरा इतना कहा कीजिए।" जब उसने वैदेही देने को कहा, तो मूढ़ ने उसे लात मारी। (रावण के) चरणों में सिर नवाकर वह वहाँ गया जहाँ कृपासिंधु रघुनाथ थे; प्रणाम कर अपनी कथा सुनाई, और राम की कृपा से अपनी गति (रूप) पाई। हे भवानी! ऋषि अगस्त्य के शाप से वह राक्षस हुआ था — (वस्तुतः) ज्ञानी मुनि; बार-बार राम के चरण वंदन कर मुनि अपने आश्रम को चले। (इधर) जड़ समुद्र विनय न माने; तीन दिन बीत गए; तब राम सक्रोध बोले — भय बिना प्रीति (अनुपालन) नहीं होती।