Mantra.Tips
सुंदरकांड

दोहा 55 / 60

पाठ सुनें

🔊 किसी भी पंक्ति को सुनने के लिए टैप करें — या पूरी चौपाई सुनने के लिए ▶ दबाएँ

Chaupāī

कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥ राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥ अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥ नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो तुम्हहि जीतै रन माहीं॥ परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै देहिं रघुनाथा॥ सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं भरि कुधर बिसाला॥ मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥ गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥

e kapi saba sugrīva samānā inha sama koṭinha ganai ko nānā rāma kṛpā~ atulita bala tinhahīṃ tṛna samāna trelokahi ganahīṃ asa maiṃ sunā śravana dasakaṃdhara paduma aṭhāraha jūthapa baṃdara nātha kaṭaka maha~ so kapi nāhīṃ jo na tumhahi jītai rana māhīṃ parama krodha mījahiṃ saba hāthā āyasu pai na dehiṃ raghunāthā soṣahiṃ siṃdhu sahita jhaṣa byālā pūrahīṃ na ta bhari kudhara bisālā mardi garda milavahiṃ dasasīsā aisei bacana kahahiṃ saba kīsā garjahiṃ tarjahiṃ sahaja asaṃkā mānahu grasana cahata hahiṃ laṃkā

Dohā

-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम॥55॥

-sahaja sūra kapi bhālu saba puni sira para prabhu rāma rāvana kāla koṭi kahu jīti sakahiṃ saṃgrāma 55

अर्थ"ये वानर सब सुग्रीव के समान हैं; इन-जैसे करोड़ों को कौन गिने? राम की कृपा से उनका बल अतुलनीय है; वे त्रैलोक्य को तृण-समान गिनते हैं। हे दशकंधर! मैंने कानों से ऐसा सुना — अठारह पद्म वानर-यूथपति हैं। हे नाथ! सेना में वह वानर नहीं जो रण में आपको न जीते। परम क्रोध में सब हाथ मलते हैं, पर रघुनाथ आज्ञा नहीं देते; (नहीं तो) मछली-साँपों सहित समुद्र सोख डालें, या विशाल पर्वतों से उसे भरकर पूर दें; दशशीश को मसलकर धूल में मिला दें — ऐसे ही वचन सब वानर कहते हैं। वे गरजते-तर्जते हैं, सहज निःशंक, मानो लंका को निगल जाना चाहते हों। सब वानर-भालू सहज शूरवीर हैं, और सिर पर प्रभु राम; वे संग्राम में करोड़ काल को भी जीत सकते हैं, रावण की तो बात ही क्या।"
साझा करें
Share:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 55 का अर्थ क्या है?
"ये वानर सब सुग्रीव के समान हैं; इन-जैसे करोड़ों को कौन गिने? राम की कृपा से उनका बल अतुलनीय है; वे त्रैलोक्य को तृण-समान गिनते हैं। हे दशकंधर! मैंने कानों से ऐसा सुना — अठारह पद्म वानर-यूथपति हैं। हे नाथ! सेना में वह वानर नहीं जो रण में आपको न जीते। परम क्रोध में सब हाथ मलते हैं, पर रघुनाथ आज्ञा नहीं देते; (नहीं तो) मछली-साँपों सहित समुद्र सोख डालें, या विशाल पर्वतों से उसे भरकर पूर दें; दशशीश को मसलकर धूल में मिला दें — ऐसे ही वचन सब वानर कहते हैं। वे गरजते-तर्जते हैं, सहज निःशंक, मानो लंका को निगल जाना चाहते हों। सब वानर-भालू सहज शूरवीर हैं, और सिर पर प्रभु राम; वे संग्राम में करोड़ काल को भी जीत सकते हैं, रावण की तो बात ही क्या।"