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सुंदरकांड

दोहा 52 / 60

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Chaupāī

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥ कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥ सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥ बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि त्यागे॥ जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥ सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए॥ रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

pragaṭa bakhānahiṃ rāma subhāū ati saprema gā bisari durāū ripu ke dūta kapinha taba jāne sakala bā~dhi kapīsa pahiṃ āne kaha sugrīva sunahu saba bānara aṃga bhaṃga kari paṭhavahu nisicara suni sugrīva bacana kapi dhāe bā~dhi kaṭaka cahu pāsa phirāe bahu prakāra mārana kapi lāge dīna pukārata tadapi na tyāge jo hamāra hara nāsā kānā tehi kosalādhīsa kai ānā suni lachimana saba nikaṭa bolāe dayā lāgi ha~si turata choḍāe rāvana kara dījahu yaha pātī lachimana bacana bācu kulaghātī

Dohā

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलेहु आवा काल तुम्हार॥52॥

kahehu mukhāgara mūḍha sana mama saṃdesu udāra sītā dei milehu na ta āvā kāla tumhāra 52

अर्थउन्होंने प्रकट रूप से राम का स्वभाव बखाना; अत्यंत प्रेम में उनका छिपाव भूल गया। तब वानरों ने उन्हें शत्रु के दूत जाना, सबको बाँधकर सुग्रीव के पास लाए। सुग्रीव बोले, "हे सब वानरो! सुनो — निशाचरों के अंग-भंग करके भेज दो।" सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े, बाँधकर सेना के चारों ओर फिराया; अनेक प्रकार से मारने लगे; (दूत) दीन होकर पुकारते, फिर भी न छोड़ा। "जो हमारी नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश की शपथ!" यह सुनकर लक्ष्मण ने सबको निकट बुलाया और दया आने से तुरंत हँसकर छुड़ा दिया: "यह पत्र रावण के हाथ देना; हे कुलघाती! लक्ष्मण के वचन पढ़ना। मूढ़ के सामने मुखाग्र (ज़ोर से) मेरा उदार संदेश कहना: सीता देकर मिल जाओ, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 52 का अर्थ क्या है?
उन्होंने प्रकट रूप से राम का स्वभाव बखाना; अत्यंत प्रेम में उनका छिपाव भूल गया। तब वानरों ने उन्हें शत्रु के दूत जाना, सबको बाँधकर सुग्रीव के पास लाए। सुग्रीव बोले, "हे सब वानरो! सुनो — निशाचरों के अंग-भंग करके भेज दो।" सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े, बाँधकर सेना के चारों ओर फिराया; अनेक प्रकार से मारने लगे; (दूत) दीन होकर पुकारते, फिर भी न छोड़ा। "जो हमारी नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश की शपथ!" यह सुनकर लक्ष्मण ने सबको निकट बुलाया और दया आने से तुरंत हँसकर छुड़ा दिया: "यह पत्र रावण के हाथ देना; हे कुलघाती! लक्ष्मण के वचन पढ़ना। मूढ़ के सामने मुखाग्र (ज़ोर से) मेरा उदार संदेश कहना: सीता देकर मिल जाओ, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया।"