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सुंदरकांड

दोहा 51 / 60

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Chaupāī

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥ मंत्र यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥ नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥ कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥ सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥ अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥ प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥ जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

sakhā kahī tumha nīki upāī karia daiva jauṃ hoi sahāī maṃtra na yaha lachimana mana bhāvā rāma bacana suni ati dukha pāvā nātha daiva kara kavana bharosā soṣia siṃdhu karia mana rosā kādara mana kahu~ eka adhārā daiva daiva ālasī pukārā sunata bihasi bole raghubīrā aisehiṃ karaba dharahu mana dhīrā asa kahi prabhu anujahi samujhāī siṃdhu samīpa gae raghurāī prathama pranāma kīnha siru nāī baiṭhe puni taṭa darbha ḍasāī jabahiṃ bibhīṣana prabhu pahiṃ āe pācheṃ rāvana dūta paṭhāe

Dohā

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥51॥

sakala carita tinha dekhe dhareṃ kapaṭa kapi deha prabhu guna hṛdaya~ sarāhahiṃ saranāgata para neha 51

अर्थ"हे सखा! तुमने अच्छा उपाय कहा; ऐसा ही किया जाए — यदि दैव सहायक हो।" यह मंत्र लक्ष्मण के मन को न भाया; राम के वचन सुनकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ: "हे नाथ! दैव का क्या भरोसा? मन में रोष कर समुद्र को सोख डालिए। कायर के मन को एक ही आधार होता है; आलसी 'दैव-दैव' पुकारता है।" सुनकर रघुवीर हँसकर बोले, "ऐसा ही करूँगा; मन में धीरज धरो।" ऐसा कहकर और अनुज को समझाकर रघुराज समुद्र के समीप गए; पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर तट पर कुश बिछाकर बैठ गए। ज्यों ही विभीषण प्रभु के पास आए, रावण ने पीछे दूत भेजे। उन्होंने कपट से वानर-देह धरकर सब चरित्र देखे; हृदय में प्रभु के गुणों की सराहना की — शरणागत पर उनका स्नेह।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 51 का अर्थ क्या है?
"हे सखा! तुमने अच्छा उपाय कहा; ऐसा ही किया जाए — यदि दैव सहायक हो।" यह मंत्र लक्ष्मण के मन को न भाया; राम के वचन सुनकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ: "हे नाथ! दैव का क्या भरोसा? मन में रोष कर समुद्र को सोख डालिए। कायर के मन को एक ही आधार होता है; आलसी 'दैव-दैव' पुकारता है।" सुनकर रघुवीर हँसकर बोले, "ऐसा ही करूँगा; मन में धीरज धरो।" ऐसा कहकर और अनुज को समझाकर रघुराज समुद्र के समीप गए; पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर तट पर कुश बिछाकर बैठ गए। ज्यों ही विभीषण प्रभु के पास आए, रावण ने पीछे दूत भेजे। उन्होंने कपट से वानर-देह धरकर सब चरित्र देखे; हृदय में प्रभु के गुणों की सराहना की — शरणागत पर उनका स्नेह।