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सुंदरकांड

दोहा 50 / 60

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Chaupāī

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥ निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥ पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥ बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥ सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥ संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥ कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥

asa prabhu chāḍi bhajahiṃ je ānā te nara pasu binu pū~cha biṣānā nija jana jāni tāhi apanāvā prabhu subhāva kapi kula mana bhāvā puni sarbagya sarba ura bāsī sarbarūpa saba rahita udāsī bole bacana nīti pratipālaka kārana manuja danuja kula ghālaka sunu kapīsa laṃkāpati bīrā kehi bidhi taria jaladhi gaṃbhīrā saṃkula makara uraga jhaṣa jātī ati agādha dustara saba bhā~tī kaha laṃkesa sunahu raghunāyaka koṭi siṃdhu soṣaka tava sāyaka jadyapi tadapi nīti asi gāī binaya karia sāgara sana jāī

Dohā

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥50॥

prabhu tumhāra kulagura jaladhi kahihi upāya bicāri binu prayāsa sāgara tarihi sakala bhālu kapi dhāri 50

अर्थ(ऐसे प्रभु को) जो छोड़कर और किसी को भजते हैं, वे बिना पूँछ-सींग के पशु हैं। उन्हें अपना जन जानकर (प्रभु ने) अपनाया; प्रभु का स्वभाव वानर-कुल के मन को भाया। फिर सर्वज्ञ, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित और उदासीन (प्रभु) नीति का प्रतिपालन करने वाले वचन बोले — कारण-रूप, मनुष्य-देह धारी, दनुज-कुल के नाशक: "हे कपीश! और हे लंकापति वीर! सुनो — मगरमच्छ, सर्प और (अनेक) जाति की मछलियों से भरा, अत्यंत अगाध और सब प्रकार से दुस्तर यह गंभीर समुद्र किस विधि तरा जाए?" लंकेश ने कहा, "हे रघुनायक! सुनिए — यद्यपि आपका बाण करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला है, फिर भी नीति ऐसी गाई गई है: जाकर सागर से विनय कीजिए। हे प्रभु! समुद्र आपके कुलगुरु हैं — वे विचारकर उपाय बताएँगे, और बिना प्रयास के समस्त भालू-वानर की सेना तर जाएगी।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 50 का अर्थ क्या है?
(ऐसे प्रभु को) जो छोड़कर और किसी को भजते हैं, वे बिना पूँछ-सींग के पशु हैं। उन्हें अपना जन जानकर (प्रभु ने) अपनाया; प्रभु का स्वभाव वानर-कुल के मन को भाया। फिर सर्वज्ञ, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित और उदासीन (प्रभु) नीति का प्रतिपालन करने वाले वचन बोले — कारण-रूप, मनुष्य-देह धारी, दनुज-कुल के नाशक: "हे कपीश! और हे लंकापति वीर! सुनो — मगरमच्छ, सर्प और (अनेक) जाति की मछलियों से भरा, अत्यंत अगाध और सब प्रकार से दुस्तर यह गंभीर समुद्र किस विधि तरा जाए?" लंकेश ने कहा, "हे रघुनायक! सुनिए — यद्यपि आपका बाण करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला है, फिर भी नीति ऐसी गाई गई है: जाकर सागर से विनय कीजिए। हे प्रभु! समुद्र आपके कुलगुरु हैं — वे विचारकर उपाय बताएँगे, और बिना प्रयास के समस्त भालू-वानर की सेना तर जाएगी।"