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सुंदरकांड

दोहा 49 / 60

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Chaupāī

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥ राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥ सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥ पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात प्रेमु अपारा॥ सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥ उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

sunu laṃkesa sakala guna toreṃ tāteṃ tumha atisaya priya moreṃ rāma bacana suni bānara jūthā sakala kahahiṃ jaya kṛpā barūthā sunata bibhīṣanu prabhu kai bānī nahiṃ aghāta śravanāmṛta jānī pada aṃbuja gahi bārahiṃ bārā hṛdaya~ samāta na premu apārā sunahu deva sacarācara svāmī pranatapāla ura aṃtarajāmī ura kachu prathama bāsanā rahī prabhu pada prīti sarita so bahī aba kṛpāla nija bhagati pāvanī dehu sadā siva mana bhāvanī evamastu kahi prabhu ranadhīrā māgā turata siṃdhu kara nīrā jadapi sakhā tava icchā nāhīṃ mora darasu amogha jaga māhīṃ asa kahi rāma tilaka tehi sārā sumana bṛṣṭi nabha bhaī apārā

Dohā

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥49(क)॥ जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥49(ख)॥

rāvana krodha anala nija svāsa samīra pracaṃḍa jarata bibhīṣanu rākheu dīnhehu rāju akhaṃḍa 49(ka) jo saṃpati siva rāvanahi dīnhi die~ dasa mātha soi saṃpadā bibhīṣanahi sakuci dīnha raghunātha 49(kha)

अर्थ"हे लंकेश! सुनो — ये सब गुण तुम में हैं; इसीलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।" राम के वचन सुनकर वानर-यूथ सब बोले, "कृपा के समूह की जय!" प्रभु की वाणी सुनकर विभीषण — उसे श्रवण-अमृत जानकर — तृप्त नहीं हुए; बार-बार चरण-कमल पकड़े, अपार प्रेम हृदय में समाता न था। "हे देव! चराचर के स्वामी, प्रणतपाल, हृदय के अंतर्यामी, सुनिए: मेरे हृदय में पहले कुछ वासना रही, पर वह प्रभु के चरणों की प्रीति-रूपी नदी में बह गई। अब हे कृपालु! सदा शिव के मन को भाने वाली अपनी पावन भक्ति दीजिए।" "एवमस्तु" कहकर रणधीर प्रभु ने तुरंत समुद्र का जल माँगा: "हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं, पर जगत् में मेरा दर्शन अमोघ है।" ऐसा कहकर राम ने उन्हें तिलक किया; आकाश से अपार पुष्प-वृष्टि हुई। रावण के क्रोध-रूपी अग्नि को अपने श्वास-रूपी प्रचंड पवन से (धधका हुआ), उसमें जलते विभीषण को (राम ने) बचा लिया और अखंड राज्य दिया। जो संपत्ति शिव ने रावण को दस सिर चढ़ाने पर दी, वही संपदा रघुनाथ ने सकुचाते हुए विभीषण को दी।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 49 का अर्थ क्या है?
"हे लंकेश! सुनो — ये सब गुण तुम में हैं; इसीलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।" राम के वचन सुनकर वानर-यूथ सब बोले, "कृपा के समूह की जय!" प्रभु की वाणी सुनकर विभीषण — उसे श्रवण-अमृत जानकर — तृप्त नहीं हुए; बार-बार चरण-कमल पकड़े, अपार प्रेम हृदय में समाता न था। "हे देव! चराचर के स्वामी, प्रणतपाल, हृदय के अंतर्यामी, सुनिए: मेरे हृदय में पहले कुछ वासना रही, पर वह प्रभु के चरणों की प्रीति-रूपी नदी में बह गई। अब हे कृपालु! सदा शिव के मन को भाने वाली अपनी पावन भक्ति दीजिए।" "एवमस्तु" कहकर रणधीर प्रभु ने तुरंत समुद्र का जल माँगा: "हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं, पर जगत् में मेरा दर्शन अमोघ है।" ऐसा कहकर राम ने उन्हें तिलक किया; आकाश से अपार पुष्प-वृष्टि हुई। रावण के क्रोध-रूपी अग्नि को अपने श्वास-रूपी प्रचंड पवन से (धधका हुआ), उसमें जलते विभीषण को (राम ने) बचा लिया और अखंड राज्य दिया। जो संपत्ति शिव ने रावण को दस सिर चढ़ाने पर दी, वही संपदा रघुनाथ ने सकुचाते हुए विभीषण को दी।