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सुंदरकांड

दोहा 48 / 60

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Chaupāī

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥ तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥ जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥ सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥ अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥ तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

sunahu sakhā nija kahau~ subhāū jāna bhusuṃḍi saṃbhu girijāū jauṃ nara hoi carācara drohī āve sabhaya sarana taki mohī taji mada moha kapaṭa chala nānā karau~ sadya tehi sādhu samānā jananī janaka baṃdhu suta dārā tanu dhanu bhavana suhrada parivārā saba kai mamatā tāga baṭorī mama pada manahi bā~dha bari ḍorī samadarasī icchā kachu nāhīṃ haraṣa soka bhaya nahiṃ mana māhīṃ asa sajjana mama ura basa kaiseṃ lobhī hṛdaya~ basai dhanu jaiseṃ tumha sārikhe saṃta priya moreṃ dharau~ deha nahiṃ āna nihoreṃ

Dohā

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥

saguna upāsaka parahita nirata nīti dṛḍha nema te nara prāna samāna mama jinha keṃ dvija pada prema 48

अर्थ"हे सखा! सुनो, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे भुसुंडि, शंभु और गिरिजा जानते हैं: यदि कोई मनुष्य चराचर का द्रोही हो, फिर भी भयभीत होकर मेरी शरण ताककर आए, और मद, मोह, कपट तथा नाना छल त्याग दे, तो मैं उसे तुरंत साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, सुहृद और परिवार — सबकी ममता के तागे बटोरकर एक डोरी बनाकर मन को मेरे चरणों में बाँध दे। समदर्शी, इच्छारहित, मन में हर्ष-शोक-भय रहित — ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे बसता है जैसे लोभी के हृदय में धन। तुम्हारे सरीखे संत मुझे प्रिय हैं; और किसी के निहोरे (कारण) मैं देह नहीं धरता।" सगुण के उपासक, परहित में लगे, नीति में दृढ़ और नियम में पक्के — वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं, जिनके हृदय में ब्राह्मणों के चरणों का प्रेम है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 48 का अर्थ क्या है?
"हे सखा! सुनो, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे भुसुंडि, शंभु और गिरिजा जानते हैं: यदि कोई मनुष्य चराचर का द्रोही हो, फिर भी भयभीत होकर मेरी शरण ताककर आए, और मद, मोह, कपट तथा नाना छल त्याग दे, तो मैं उसे तुरंत साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, सुहृद और परिवार — सबकी ममता के तागे बटोरकर एक डोरी बनाकर मन को मेरे चरणों में बाँध दे। समदर्शी, इच्छारहित, मन में हर्ष-शोक-भय रहित — ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे बसता है जैसे लोभी के हृदय में धन। तुम्हारे सरीखे संत मुझे प्रिय हैं; और किसी के निहोरे (कारण) मैं देह नहीं धरता।" सगुण के उपासक, परहित में लगे, नीति में दृढ़ और नियम में पक्के — वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं, जिनके हृदय में ब्राह्मणों के चरणों का प्रेम है।