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सुंदरकांड

दोहा 47 / 60

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Chaupāī

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥ जब लगि उर बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥ ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥ तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि ब्याप त्रिबिध भव सूला॥ मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥ जासु रूप मुनि ध्यान आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥

taba lagi hṛdaya~ basata khala nānā lobha moha macchara mada mānā jaba lagi ura na basata raghunāthā dhareṃ cāpa sāyaka kaṭi bhāthā mamatā taruna tamī a~dhiārī rāga dveṣa ulūka sukhakārī taba lagi basati jīva mana māhīṃ jaba lagi prabhu pratāpa rabi nāhīṃ aba maiṃ kusala miṭe bhaya bhāre dekhi rāma pada kamala tumhāre tumha kṛpāla jā para anukūlā tāhi na byāpa tribidha bhava sūlā maiṃ nisicara ati adhama subhāū subha ācaranu kīnha nahiṃ kāū jāsu rūpa muni dhyāna na āvā tehiṃ prabhu haraṣi hṛdaya~ mohi lāvā

Dohā

-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज॥47॥

-ahobhāgya mama amita ati rāma kṛpā sukha puṃja dekheu~ nayana biraṃci siba sebya jugala pada kaṃja 47

अर्थतब तक हृदय में अनेक दुष्ट — लोभ, मोह, मत्सर, मद और मान — बसते हैं, जब तक उसमें धनुष-बाण और कमर में तरकश धारण किए रघुनाथ नहीं बसते। (तब तक) ममता की घोर रात्रि अंधकारमयी रहती है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुखकारी है; (तब तक) वे जीव के मन में बसते हैं, जब तक प्रभु के प्रताप-रूपी सूर्य का (उदय) नहीं हुआ। "हे राम! अब मैं कुशल हूँ, मेरे भारी भय मिट गए, आपके चरण-कमल देखकर। हे कृपालु! आप जिस पर अनुकूल हों, उसे त्रिविध भव-पीड़ा नहीं व्यापती। मैं निशाचर, अत्यंत अधम स्वभाव; मैंने कभी एक भी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।" हे राम, कृपा और सुख के पुंज! मेरा अहोभाग्य अमित और अत्यंत है — मैंने ब्रह्मा और शिव द्वारा सेव्य दोनों चरण-कमल नेत्रों से देखे।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 47 का अर्थ क्या है?
तब तक हृदय में अनेक दुष्ट — लोभ, मोह, मत्सर, मद और मान — बसते हैं, जब तक उसमें धनुष-बाण और कमर में तरकश धारण किए रघुनाथ नहीं बसते। (तब तक) ममता की घोर रात्रि अंधकारमयी रहती है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुखकारी है; (तब तक) वे जीव के मन में बसते हैं, जब तक प्रभु के प्रताप-रूपी सूर्य का (उदय) नहीं हुआ। "हे राम! अब मैं कुशल हूँ, मेरे भारी भय मिट गए, आपके चरण-कमल देखकर। हे कृपालु! आप जिस पर अनुकूल हों, उसे त्रिविध भव-पीड़ा नहीं व्यापती। मैं निशाचर, अत्यंत अधम स्वभाव; मैंने कभी एक भी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।" हे राम, कृपा और सुख के पुंज! मेरा अहोभाग्य अमित और अत्यंत है — मैंने ब्रह्मा और शिव द्वारा सेव्य दोनों चरण-कमल नेत्रों से देखे।