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सुंदरकांड

दोहा 46 / 60

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Chaupāī

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥ अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥ कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥ मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन भाव अनीती॥ बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥ अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥

asa kahi karata daṃḍavata dekhā turata uṭhe prabhu haraṣa biseṣā dīna bacana suni prabhu mana bhāvā bhuja bisāla gahi hṛdaya~ lagāvā anuja sahita mili ḍhiga baiṭhārī bole bacana bhagata bhayahārī kahu laṃkesa sahita parivārā kusala kuṭhāhara bāsa tumhārā khala maṃḍalīṃ basahu dinu rātī sakhā dharama nibahai kehi bhā~tī maiṃ jānau~ tumhāri saba rītī ati naya nipuna na bhāva anītī baru bhala bāsa naraka kara tātā duṣṭa saṃga jani dei bidhātā aba pada dekhi kusala raghurāyā jauṃ tumha kīnha jāni jana dāyā

Dohā

तब लगि कुसल जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥

taba lagi kusala na jīva kahu~ sapanehu~ mana biśrāma jaba lagi bhajata na rāma kahu~ soka dhāma taji kāma 46

अर्थऐसा कहते हुए (विभीषण को) दंडवत करते देख प्रभु विशेष हर्ष से तुरंत उठे। दीन वचन सुनकर प्रभु के मन को भाया; विशाल भुजाओं से पकड़कर हृदय से लगा लिया। अनुज सहित मिलकर पास बैठाया, और भक्तों का भय हरने वाले वचन बोले: "हे लंकेश! परिवार सहित कहो — ऐसे कुठौर में आपका वास कुशल तो है? हे सखा! दुष्टों की मंडली में दिन-रात बसकर धर्म किस प्रकार निभता है? मैं आपकी सब रीति जानता हूँ — आप अति नीति-निपुण हैं, अनीति आपको नहीं भाती। हे तात! नरक में बास भी अच्छा — पर विधाता दुष्ट का संग न दे। अब (मेरे) चरण देखकर कुशल है, हे रघुराज, क्योंकि आपने मुझे जन जानकर दया की।" तब तक जीव को कुशल नहीं, न स्वप्न में भी मन को विश्राम, जब तक वह काम (शोक के धाम) को त्यागकर राम को नहीं भजता।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 46 का अर्थ क्या है?
ऐसा कहते हुए (विभीषण को) दंडवत करते देख प्रभु विशेष हर्ष से तुरंत उठे। दीन वचन सुनकर प्रभु के मन को भाया; विशाल भुजाओं से पकड़कर हृदय से लगा लिया। अनुज सहित मिलकर पास बैठाया, और भक्तों का भय हरने वाले वचन बोले: "हे लंकेश! परिवार सहित कहो — ऐसे कुठौर में आपका वास कुशल तो है? हे सखा! दुष्टों की मंडली में दिन-रात बसकर धर्म किस प्रकार निभता है? मैं आपकी सब रीति जानता हूँ — आप अति नीति-निपुण हैं, अनीति आपको नहीं भाती। हे तात! नरक में बास भी अच्छा — पर विधाता दुष्ट का संग न दे। अब (मेरे) चरण देखकर कुशल है, हे रघुराज, क्योंकि आपने मुझे जन जानकर दया की।" तब तक जीव को कुशल नहीं, न स्वप्न में भी मन को विश्राम, जब तक वह काम (शोक के धाम) को त्यागकर राम को नहीं भजता।