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सुंदरकांड

दोहा 53 / 60

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Chaupāī

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥ कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥ बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि सुक आपनि कुसलाता॥ पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥ करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥ पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥ जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥ कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

turata nāi lachimana pada māthā cale dūta baranata guna gāthā kahata rāma jasu laṃkā~ āe rāvana carana sīsa tinha nāe bihasi dasānana pū~chī bātā kahasi na suka āpani kusalātā puni kahu khabari bibhīṣana kerī jāhi mṛtyu āī ati nerī karata rāja laṃkā saṭha tyāgī hoihi jaba kara kīṭa abhāgī puni kahu bhālu kīsa kaṭakāī kaṭhina kāla prerita cali āī jinha ke jīvana kara rakhavārā bhayau mṛdula cita siṃdhu bicārā kahu tapasinha kai bāta bahorī jinha ke hṛdaya~ trāsa ati morī

Dohā

-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥53॥

-kī bhai bheṃṭa ki phiri gae śravana sujasu suni mora kahasi na ripu dala teja bala bahuta cakita cita tora 53

अर्थतुरंत लक्ष्मण के चरणों में सिर नवाकर दूत चले, उनके (राम के) गुणों की गाथा वर्णन करते हुए। राम का यश गाते हुए वे लंका आए और रावण के चरणों में सिर नवाए। दशानन ने हँसकर बात पूछी: "हे शुक! क्या तू अपनी कुशल नहीं कहता? फिर विभीषण की खबर कह, जिसे मृत्यु अत्यंत निकट आ गई — जिस मूढ़ ने लंका का राज त्याग दिया; वह अभागा कब काल का कीट होगा? फिर भालू-वानर की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से चली आई — जिनके जीवन का रक्षक कोमल-चित्त मूढ़ समुद्र हो गया। फिर उन तपस्वियों की बात कह, जिनके हृदय में मेरा अत्यंत त्रास है — क्या (सेना से) भेंट हुई, या मेरा सुयश सुनकर लौट गए? कह — क्या शत्रु-दल के तेज-बल से तेरा चित्त बहुत चकित नहीं है?"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 53 का अर्थ क्या है?
तुरंत लक्ष्मण के चरणों में सिर नवाकर दूत चले, उनके (राम के) गुणों की गाथा वर्णन करते हुए। राम का यश गाते हुए वे लंका आए और रावण के चरणों में सिर नवाए। दशानन ने हँसकर बात पूछी: "हे शुक! क्या तू अपनी कुशल नहीं कहता? फिर विभीषण की खबर कह, जिसे मृत्यु अत्यंत निकट आ गई — जिस मूढ़ ने लंका का राज त्याग दिया; वह अभागा कब काल का कीट होगा? फिर भालू-वानर की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से चली आई — जिनके जीवन का रक्षक कोमल-चित्त मूढ़ समुद्र हो गया। फिर उन तपस्वियों की बात कह, जिनके हृदय में मेरा अत्यंत त्रास है — क्या (सेना से) भेंट हुई, या मेरा सुयश सुनकर लौट गए? कह — क्या शत्रु-दल के तेज-बल से तेरा चित्त बहुत चकित नहीं है?"