Mantra.Tips
सुंदरकांड

दोहा 40 / 60

पाठ सुनें

🔊 किसी भी पंक्ति को सुनने के लिए टैप करें — या पूरी चौपाई सुनने के लिए ▶ दबाएँ

Chaupāī

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥ रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि करहु इहाँ हइ कोऊ॥ माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥ सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

mālyavaṃta ati saciva sayānā tāsu bacana suni ati sukha mānā tāta anuja tava nīti bibhūṣana so ura dharahu jo kahata bibhīṣana ripu utakaraṣa kahata saṭha doū dūri na karahu ihā~ hai koū mālyavaṃta gṛha gayau bahorī kahai bibhīṣanu puni kara jorī sumati kumati saba keṃ ura rahahīṃ nātha purāna nigama asa kahahīṃ jahā~ sumati taha~ saṃpati nānā jahā~ kumati taha~ bipati nidānā tava ura kumati basī biparītā hita anahita mānahu ripu prītā kālarāti nisicara kula kerī tehi sītā para prīti ghanerī

Dohā

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीत देहु राम कहुँ अहित होइ तुम्हार॥40॥

tāta carana gahi māgau~ rākhahu mora dulāra sīta dehu rāma kahu~ ahita na hoi tumhāra 40

अर्थमाल्यवान् नामक अत्यंत बुद्धिमान् मंत्री ने उनके वचन सुनकर बहुत सुख माना: "हे तात! आपका अनुज नीति का भूषण है; विभीषण जो कहता है, उसे हृदय में धरिए।" (रावण बोला —) "ये दोनों मूढ़ शत्रु का उत्कर्ष कहते हैं — यहाँ कोई है कि नहीं? इन्हें दूर करो!" तब माल्यवान् घर चला गया; विभीषण ने फिर हाथ जोड़कर कहा — "हे नाथ! सुमति और कुमति सबके हृदय में रहती हैं — पुराण-निगम ऐसा कहते हैं। जहाँ सुमति, वहाँ नाना संपत्ति; जहाँ कुमति, वहाँ अंत में विपत्ति। आपके हृदय में विपरीत कुमति बस गई है — आप हित को अहित और शत्रु को प्रिय मानते हैं। जो निशाचर-कुल के लिए कालरात्रि है, उस सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है। हे तात! चरण पकड़कर माँगता हूँ — मेरा दुलार रखिए; सीता राम को दे दीजिए, ताकि आपका अहित न हो।"
साझा करें
Share:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 40 का अर्थ क्या है?
माल्यवान् नामक अत्यंत बुद्धिमान् मंत्री ने उनके वचन सुनकर बहुत सुख माना: "हे तात! आपका अनुज नीति का भूषण है; विभीषण जो कहता है, उसे हृदय में धरिए।" (रावण बोला —) "ये दोनों मूढ़ शत्रु का उत्कर्ष कहते हैं — यहाँ कोई है कि नहीं? इन्हें दूर करो!" तब माल्यवान् घर चला गया; विभीषण ने फिर हाथ जोड़कर कहा — "हे नाथ! सुमति और कुमति सबके हृदय में रहती हैं — पुराण-निगम ऐसा कहते हैं। जहाँ सुमति, वहाँ नाना संपत्ति; जहाँ कुमति, वहाँ अंत में विपत्ति। आपके हृदय में विपरीत कुमति बस गई है — आप हित को अहित और शत्रु को प्रिय मानते हैं। जो निशाचर-कुल के लिए कालरात्रि है, उस सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है। हे तात! चरण पकड़कर माँगता हूँ — मेरा दुलार रखिए; सीता राम को दे दीजिए, ताकि आपका अहित न हो।"