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सुंदरकांड

दोहा 39 / 60

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Chaupāī

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥ देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ सरन गएँ प्रभु ताहु त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

tāta rāma nahiṃ nara bhūpālā bhuvanesvara kālahu kara kālā brahma anāmaya aja bhagavaṃtā byāpaka ajita anādi anaṃtā go dvija dhenu deva hitakārī kṛpāsiṃdhu mānuṣa tanudhārī jana raṃjana bhaṃjana khala brātā beda dharma racchaka sunu bhrātā tāhi bayaru taji nāia māthā pranatārati bhaṃjana raghunāthā dehu nātha prabhu kahu~ baidehī bhajahu rāma binu hetu sanehī sarana gae~ prabhu tāhu na tyāgā bisva droha kṛta agha jehi lāgā jāsu nāma traya tāpa nasāvana soi prabhu pragaṭa samujhu jiya~ rāvana

Dohā

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39(क)॥ मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥39(ख)॥

bāra bāra pada lāgau~ binaya karau~ dasasīsa parihari māna moha mada bhajahu kosalādhīsa 39(ka) muni pulasti nija siṣya sana kahi paṭhaī yaha bāta turata so maiṃ prabhu sana kahī pāi suavasaru tāta 39(kha)

अर्थ"हे तात! राम मनुष्य या राजा नहीं — वे भुवनेश्वर, काल के भी काल, अनामय ब्रह्म, अजन्मा भगवान्, व्यापक, अजित, अनादि और अनंत हैं। गो, ब्राह्मण, धेनु (पृथ्वी) और देवताओं के हितकारी, कृपासिंधु मानव-देह धारण किए हुए; भक्तों को रिझाने वाले, दुष्ट-समूह का नाश करने वाले, वेद-धर्म के रक्षक — सुनिए, भ्राता। उनसे बैर त्यागकर माथा नवाइए — प्रणत की पीड़ा हरने वाले रघुनाथ। हे स्वामी! प्रभु को वैदेही दे दीजिए; बिना हेतु के स्नेही राम को भजिए। शरण गए को प्रभु नहीं त्यागते — चाहे विश्व-द्रोह का पाप ही क्यों न लगा हो। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करता है, वही प्रभु प्रकट (यहाँ) हैं; हे रावण! जी में समझो। हे दशशीश! बार-बार चरणों लगता हूँ, विनय करता हूँ: मान-मोह-मद त्यागकर कोसलाधीश को भजिए। मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य से यह बात कहला भेजी; हे तात! सुअवसर पाकर वह मैंने तुरंत प्रभु (आप) से कह दी।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 39 का अर्थ क्या है?
"हे तात! राम मनुष्य या राजा नहीं — वे भुवनेश्वर, काल के भी काल, अनामय ब्रह्म, अजन्मा भगवान्, व्यापक, अजित, अनादि और अनंत हैं। गो, ब्राह्मण, धेनु (पृथ्वी) और देवताओं के हितकारी, कृपासिंधु मानव-देह धारण किए हुए; भक्तों को रिझाने वाले, दुष्ट-समूह का नाश करने वाले, वेद-धर्म के रक्षक — सुनिए, भ्राता। उनसे बैर त्यागकर माथा नवाइए — प्रणत की पीड़ा हरने वाले रघुनाथ। हे स्वामी! प्रभु को वैदेही दे दीजिए; बिना हेतु के स्नेही राम को भजिए। शरण गए को प्रभु नहीं त्यागते — चाहे विश्व-द्रोह का पाप ही क्यों न लगा हो। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करता है, वही प्रभु प्रकट (यहाँ) हैं; हे रावण! जी में समझो। हे दशशीश! बार-बार चरणों लगता हूँ, विनय करता हूँ: मान-मोह-मद त्यागकर कोसलाधीश को भजिए। मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य से यह बात कहला भेजी; हे तात! सुअवसर पाकर वह मैंने तुरंत प्रभु (आप) से कह दी।"