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सुंदरकांड

दोहा 41 / 60

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Chaupāī

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥ सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई॥ जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ कहसि खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही॥ मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥ अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥ उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥

budha purāna śruti saṃmata bānī kahī bibhīṣana nīti bakhānī sunata dasānana uṭhā risāī khala tohi nikaṭa mutyu aba āī jiasi sadā saṭha mora jiāvā ripu kara paccha mūḍha tohi bhāvā kahasi na khala asa ko jaga māhīṃ bhuja bala jāhi jitā maiṃ nāhī mama pura basi tapasinha para prītī saṭha milu jāi tinhahi kahu nītī asa kahi kīnhesi carana prahārā anuja gahe pada bārahiṃ bārā umā saṃta kai ihai baḍāī maṃda karata jo karai bhalāī tumha pitu sarisa bhalehiṃ mohi mārā rāmu bhajeṃ hita nātha tumhārā saciva saṃga lai nabha patha gayaū sabahi sunāi kahata asa bhayaū

Dohā

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥

rāmu satyasaṃkalpa prabhu sabhā kālabasa tori mai raghubīra sarana aba jāu~ dehu jani khori 41

अर्थविभीषण ने ज्ञानियों, पुराणों और श्रुति से सम्मत नीति बखानकर कही। सुनते ही दशानन क्रोध से उठा: "रे खल! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई! रे मूढ़! तू सदा मेरे जिलाए जीता है, फिर भी तुझे शत्रु का पक्ष भाता है। कह रे खल — जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने भुजबल से न जीता हो? मेरे नगर में बसकर तपस्वियों पर प्रीति? रे मूढ़! जा, उन्हीं से मिल और उन्हें नीति सिखा!" ऐसा कहकर लात मारी; फिर भी अनुज ने बार-बार चरण पकड़े। (शिव कहते हैं —) हे उमा! संत की यही बड़ाई है — जो बुरा करे, उसका भी भला करते हैं। "आप पिता-समान हैं; भले ही मुझे मारा। हे नाथ! राम को भजने में ही आपका हित है।" मंत्रियों को साथ लेकर वे आकाश-मार्ग से गए, और सबको सुनाकर यह कहते हुए चले: "राम सत्यसंकल्प प्रभु हैं; (लंका की) सभा और तुम काल के वश हो। मैं अब रघुवीर की शरण जाता हूँ; मुझे दोष न देना।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 41 का अर्थ क्या है?
विभीषण ने ज्ञानियों, पुराणों और श्रुति से सम्मत नीति बखानकर कही। सुनते ही दशानन क्रोध से उठा: "रे खल! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई! रे मूढ़! तू सदा मेरे जिलाए जीता है, फिर भी तुझे शत्रु का पक्ष भाता है। कह रे खल — जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने भुजबल से न जीता हो? मेरे नगर में बसकर तपस्वियों पर प्रीति? रे मूढ़! जा, उन्हीं से मिल और उन्हें नीति सिखा!" ऐसा कहकर लात मारी; फिर भी अनुज ने बार-बार चरण पकड़े। (शिव कहते हैं —) हे उमा! संत की यही बड़ाई है — जो बुरा करे, उसका भी भला करते हैं। "आप पिता-समान हैं; भले ही मुझे मारा। हे नाथ! राम को भजने में ही आपका हित है।" मंत्रियों को साथ लेकर वे आकाश-मार्ग से गए, और सबको सुनाकर यह कहते हुए चले: "राम सत्यसंकल्प प्रभु हैं; (लंका की) सभा और तुम काल के वश हो। मैं अब रघुवीर की शरण जाता हूँ; मुझे दोष न देना।"