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सुंदरकांड

दोहा 37 / 60

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Chaupāī

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥ सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥ जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥ कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥ अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥ मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥ बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥ बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥ जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही॥

śravana sunī saṭha tā kari bānī bihasā jagata bidita abhimānī sabhaya subhāu nāri kara sācā maṃgala mahu~ bhaya mana ati kācā jauṃ āvai markaṭa kaṭakāī jiahiṃ bicāre nisicara khāī kaṃpahiṃ lokapa jākī trāsā tāsu nāri sabhīta baḍi hāsā asa kahi bihasi tāhi ura lāī caleu sabhā~ mamatā adhikāī maṃdodarī hṛdaya~ kara ciṃtā bhayau kaṃta para bidhi biparītā baiṭheu sabhā~ khabari asi pāī siṃdhu pāra senā saba āī būjhesi saciva ucita mata kahahū te saba ha~se maṣṭa kari rahahū jitehu surāsura taba śrama nāhīṃ nara bānara kehi lekhe māhī

Dohā

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥

saciva baida gura tīni jauṃ priya bolahiṃ bhaya āsa rāja dharma tana tīni kara hoi begihīṃ nāsa 37

अर्थउसकी वाणी सुनकर जगत-विख्यात अभिमानी मूढ़ हँसा: "स्त्री का स्वभाव सचमुच भयभीत होता है — मंगल में भी उसका कच्चा मन भय (मानता) है। यदि वानरों की सेना आए, तो बेचारे निशाचर उसे खाकर (सुख से) जिएँ! जिसका पति (मैं), जिसके त्रास से लोकपाल काँपते हैं, उसकी स्त्री का भयभीत होना बड़ी हँसी है।" ऐसा कहकर हँसते हुए उसे हृदय से लगाया, और ममता बढ़ाकर सभा को चला। मंदोदरी हृदय में चिंता करने लगी — "मेरे कंत पर विधि विपरीत हो गया।" वह सभा में बैठा और यह खबर पाई कि सारी सेना समुद्र पार आ गई। उसने मंत्रियों से पूछा — "उचित मत कहो।" वे सब हँसे — "चुप होकर निश्चिंत रहिए। आपने देव-असुर बिना श्रम जीते; मनुष्य और वानर किस गिनती में?" जब मंत्री, वैद्य और गुरु — ये तीन — भय या आशा (लाभ) से प्रिय बोलते हैं, तब राज्य, शरीर और धर्म — इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 37 का अर्थ क्या है?
उसकी वाणी सुनकर जगत-विख्यात अभिमानी मूढ़ हँसा: "स्त्री का स्वभाव सचमुच भयभीत होता है — मंगल में भी उसका कच्चा मन भय (मानता) है। यदि वानरों की सेना आए, तो बेचारे निशाचर उसे खाकर (सुख से) जिएँ! जिसका पति (मैं), जिसके त्रास से लोकपाल काँपते हैं, उसकी स्त्री का भयभीत होना बड़ी हँसी है।" ऐसा कहकर हँसते हुए उसे हृदय से लगाया, और ममता बढ़ाकर सभा को चला। मंदोदरी हृदय में चिंता करने लगी — "मेरे कंत पर विधि विपरीत हो गया।" वह सभा में बैठा और यह खबर पाई कि सारी सेना समुद्र पार आ गई। उसने मंत्रियों से पूछा — "उचित मत कहो।" वे सब हँसे — "चुप होकर निश्चिंत रहिए। आपने देव-असुर बिना श्रम जीते; मनुष्य और वानर किस गिनती में?" जब मंत्री, वैद्य और गुरु — ये तीन — भय या आशा (लाभ) से प्रिय बोलते हैं, तब राज्य, शरीर और धर्म — इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।