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सुंदरकांड

दोहा 36 / 60

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Chaupāī

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥ निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥ जासु दूत बल बरनि जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥ दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥ रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥ कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु॥ समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी॥ तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥ सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित तुम्हार संभु अज कीन्हें॥

uhā~ nisācara rahahiṃ sasaṃkā jaba te jāri gayau kapi laṃkā nija nija gṛha~ saba karahiṃ bicārā nahiṃ nisicara kula kera ubārā jāsu dūta bala barani na jāī tehi āe~ pura kavana bhalāī dūtanhi sana suni purajana bānī maṃdodarī adhika akulānī rahasi jori kara pati paga lāgī bolī bacana nīti rasa pāgī kaṃta karaṣa hari sana pariharahū mora kahā ati hita hiya~ dharahu samujhata jāsu dūta kai karanī stravahīṃ garbha rajanīcara dharanī tāsu nāri nija saciva bolāī paṭhavahu kaṃta jo cahahu bhalāī taba kula kamala bipina dukhadāī sītā sīta nisā sama āī sunahu nātha sītā binu dīnheṃ hita na tumhāra saṃbhu aja kīnheṃ

Dohā

-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥36॥

-rāma bāna ahi gana sarisa nikara nisācara bheka jaba lagi grasata na taba lagi jatanu karahu taji ṭeka 36

अर्थवहाँ निशाचर तब से सशंकित रहते थे, जब से कपि लंका जलाकर गया। अपने-अपने घर में सब विचार करते — "निशाचर-कुल का उद्धार नहीं; जिसके दूत का बल वर्णन नहीं होता, उसके स्वामी के नगर आने में क्या भलाई?" दूतों से नगरवासियों की वाणी सुनकर मंदोदरी अत्यंत व्याकुल हुई। तन्मय होकर हाथ जोड़, पति के चरणों लगकर, नीति-रस में पगे वचन बोली — "हे कंत! हरि से बैर त्याग दीजिए; मेरी बात अत्यंत हित जानकर हृदय में धरिए। जिसके दूत की करनी समझते ही राक्षसियों के गर्भ गिर जाते हैं — हे कंत! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मंत्री से उसकी पत्नी (सीता) को भेज दीजिए। जैसे पाला कमल-वन के लिए घातक है, वैसे ही सीता आपके कुल के लिए शीत-रात्रि-सी (घातक) आई हैं। हे नाथ! सुनिए — सीता को दिए बिना शंभु और ब्रह्मा भी आपका हित नहीं कर सकते। राम के बाण साँपों के समूह-समान हैं और निशाचरों के झुंड मेंढक; जब तक (वे) निगल न लें, तब तक हठ छोड़कर यत्न कर लीजिए।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 36 का अर्थ क्या है?
वहाँ निशाचर तब से सशंकित रहते थे, जब से कपि लंका जलाकर गया। अपने-अपने घर में सब विचार करते — "निशाचर-कुल का उद्धार नहीं; जिसके दूत का बल वर्णन नहीं होता, उसके स्वामी के नगर आने में क्या भलाई?" दूतों से नगरवासियों की वाणी सुनकर मंदोदरी अत्यंत व्याकुल हुई। तन्मय होकर हाथ जोड़, पति के चरणों लगकर, नीति-रस में पगे वचन बोली — "हे कंत! हरि से बैर त्याग दीजिए; मेरी बात अत्यंत हित जानकर हृदय में धरिए। जिसके दूत की करनी समझते ही राक्षसियों के गर्भ गिर जाते हैं — हे कंत! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मंत्री से उसकी पत्नी (सीता) को भेज दीजिए। जैसे पाला कमल-वन के लिए घातक है, वैसे ही सीता आपके कुल के लिए शीत-रात्रि-सी (घातक) आई हैं। हे नाथ! सुनिए — सीता को दिए बिना शंभु और ब्रह्मा भी आपका हित नहीं कर सकते। राम के बाण साँपों के समूह-समान हैं और निशाचरों के झुंड मेंढक; जब तक (वे) निगल न लें, तब तक हठ छोड़कर यत्न कर लीजिए।"