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सुंदरकांड

दोहा 21 / 60

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Chaupāī

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥ की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥ मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि प्रान कइ बाधा॥ सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥ जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥ धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता। हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥

kaha laṃkesa kavana taiṃ kīsā kehiṃ ke bala ghālehi bana khīsā kī dhauṃ śravana sunehi nahiṃ mohī dekhau~ ati asaṃka saṭha tohī māre nisicara kehiṃ aparādhā kahu saṭha tohi na prāna kai bādhā suna rāvana brahmāṃḍa nikāyā pāi jāsu bala biracita māyā jākeṃ bala biraṃci hari īsā pālata sṛjata harata dasasīsā jā bala sīsa dharata sahasānana aṃḍakosa sameta giri kānana dharai jo bibidha deha suratrātā tumha te saṭhanha sikhāvanu dātā hara kodaṃḍa kaṭhina jehi bhaṃjā tehi sameta nṛpa dala mada gaṃjā khara dūṣana trisirā aru bālī badhe sakala atulita balasālī

Dohā

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥21॥

jāke bala lavalesa teṃ jitehu carācara jhāri tāsu dūta maiṃ jā kari hari ānehu priya nāri 21

अर्थलंकेश ने कहा — "रे कपि! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन उजाड़ डाला? अथवा क्या तूने मेरा नाम कानों से नहीं सुना, रे मूढ़, जो तुझे इतना निःशंक देखता हूँ? किस अपराध से तूने निशाचर मारे? कह रे मूर्ख — क्या तेरे प्राणों को संकट नहीं?" "रे रावण! सुन — जिनके बल पर ब्रह्मांडों का समूह टिका है, जिनकी शक्ति से माया रची जाती है; जिनके बल से ब्रह्मा, हरि और शिव सृष्टि, पालन व संहार करते हैं, हे दशशीश; जिनके बल से सहस्रमुख शेष पर्वत-वनों सहित अंडकोश को सिर पर धारण करते हैं; जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक देह धरते हैं और तुझ जैसे मूढ़ों को शिक्षा देने वाले हैं; जिन्होंने शिव का कठोर धनुष तोड़ा और राजाओं के दल का मद चूर किया; जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि — सब अतुलनीय बलशालियों — का वध किया; जिनके बल के लवलेश से तूने समस्त चराचर को जीता: मैं उन्हीं (प्रभु) का दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को तू हर लाया है।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 21 का अर्थ क्या है?
लंकेश ने कहा — "रे कपि! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन उजाड़ डाला? अथवा क्या तूने मेरा नाम कानों से नहीं सुना, रे मूढ़, जो तुझे इतना निःशंक देखता हूँ? किस अपराध से तूने निशाचर मारे? कह रे मूर्ख — क्या तेरे प्राणों को संकट नहीं?" "रे रावण! सुन — जिनके बल पर ब्रह्मांडों का समूह टिका है, जिनकी शक्ति से माया रची जाती है; जिनके बल से ब्रह्मा, हरि और शिव सृष्टि, पालन व संहार करते हैं, हे दशशीश; जिनके बल से सहस्रमुख शेष पर्वत-वनों सहित अंडकोश को सिर पर धारण करते हैं; जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक देह धरते हैं और तुझ जैसे मूढ़ों को शिक्षा देने वाले हैं; जिन्होंने शिव का कठोर धनुष तोड़ा और राजाओं के दल का मद चूर किया; जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि — सब अतुलनीय बलशालियों — का वध किया; जिनके बल के लवलेश से तूने समस्त चराचर को जीता: मैं उन्हीं (प्रभु) का दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को तू हर लाया है।"