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सुंदरकांड

दोहा 20 / 60

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Chaupāī

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥ तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥ दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि जाइ कछु अति प्रभुताई॥ कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देखि प्रताप कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

brahmabāna kapi kahu~ tehi mārā paratihu~ bāra kaṭaku saṃghārā tehi dekhā kapi muruchita bhayaū nāgapāsa bā~dhesi lai gayaū jāsu nāma japi sunahu bhavānī bhava baṃdhana kāṭahiṃ nara gyānī tāsu dūta ki baṃdha taru āvā prabhu kāraja lagi kapihiṃ ba~dhāvā kapi baṃdhana suni nisicara dhāe kautuka lāgi sabhā~ saba āe dasamukha sabhā dīkhi kapi jāī kahi na jāi kachu ati prabhutāī kara joreṃ sura disipa binītā bhṛkuṭi bilokata sakala sabhītā dekhi pratāpa na kapi mana saṃkā jimi ahigana mahu~ garuḍa asaṃkā

Dohā

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥20॥

kapihi biloki dasānana bihasā kahi durbāda suta badha surati kīnhi puni upajā hṛdaya~ biṣāda 20

अर्थउसने कपि को ब्रह्म-बाण मारा; फिर भी गिरते हुए उन्होंने सेना का संहार किया। कपि को मूर्च्छित देख उसने नागपाश में बाँधकर ले गया। (शिव कहते हैं —) हे भवानी! सुनो — जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य भव-बंधन काट डालते हैं, क्या उनके दूत को बंधन हो सकता है? प्रभु के कार्य के लिए कपि ने अपने को बँधा लिया। कपि का बंधन सुनकर निशाचर दौड़े; सब कौतूहल से सभा में आए। कपि ने जाकर दशमुख की सभा देखी, जिसकी अत्यंत प्रभुता कही नहीं जाती: हाथ जोड़े देव और दिक्पाल विनीत, सब भयभीत होकर (रावण की) भौंहें ताकते थे। प्रताप देखकर भी कपि के मन में शंका न हुई, जैसे साँपों के समूह में गरुड़ निःशंक रहता है। कपि को देखकर दशानन दुर्वचन कहकर हँसा; फिर पुत्र-वध का स्मरण कर उसके हृदय में विषाद उपजा।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 20 का अर्थ क्या है?
उसने कपि को ब्रह्म-बाण मारा; फिर भी गिरते हुए उन्होंने सेना का संहार किया। कपि को मूर्च्छित देख उसने नागपाश में बाँधकर ले गया। (शिव कहते हैं —) हे भवानी! सुनो — जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य भव-बंधन काट डालते हैं, क्या उनके दूत को बंधन हो सकता है? प्रभु के कार्य के लिए कपि ने अपने को बँधा लिया। कपि का बंधन सुनकर निशाचर दौड़े; सब कौतूहल से सभा में आए। कपि ने जाकर दशमुख की सभा देखी, जिसकी अत्यंत प्रभुता कही नहीं जाती: हाथ जोड़े देव और दिक्पाल विनीत, सब भयभीत होकर (रावण की) भौंहें ताकते थे। प्रताप देखकर भी कपि के मन में शंका न हुई, जैसे साँपों के समूह में गरुड़ निःशंक रहता है। कपि को देखकर दशानन दुर्वचन कहकर हँसा; फिर पुत्र-वध का स्मरण कर उसके हृदय में विषाद उपजा।