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सुंदरकांड

दोहा 19 / 60

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Chaupāī

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥ मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥ चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥ अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥ तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा। मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥ उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति जाइ प्रभंजन जाया॥

suni suta badha laṃkesa risānā paṭhaesi meghanāda balavānā mārasi jani suta bāṃdhesu tāhī dekhia kapihi kahā~ kara āhī calā iṃdrajita atulita jodhā baṃdhu nidhana suni upajā krodhā kapi dekhā dāruna bhaṭa āvā kaṭakaṭāi garjā aru dhāvā ati bisāla taru eka upārā biratha kīnha laṃkesa kumārā rahe mahābhaṭa tāke saṃgā gahi gahi kapi mardai nija aṃgā tinhahi nipāti tāhi sana bājā bhire jugala mānahu~ gajarājā muṭhikā māri caḍhā taru jāī tāhi eka chana muruchā āī uṭhi bahori kīnhisi bahu māyā jīti na jāi prabhaṃjana jāyā

Dohā

ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥19॥

brahma astra tehiṃ sā~dhā kapi mana kīnha bicāra jauṃ na brahmasara mānau~ mahimā miṭai apāra 19

अर्थपुत्र का वध सुनकर लंकेश क्रुद्ध हुआ और बलवान् मेघनाद को भेजा — "हे पुत्र! मारना नहीं, उसे बाँध लाना; देखें यह कपि कहाँ का है।" अतुलनीय योद्धा इंद्रजित चला, भाई के वध से क्रोध उपजा। कपि ने दारुण योद्धा को आते देखा; कटकटाकर गरजे और दौड़े। एक अत्यंत विशाल वृक्ष उखाड़कर लंकेश-कुमार को रथहीन कर दिया; उसके साथ के महाभटों को पकड़-पकड़कर अपने अंगों से मसल डाला। उन्हें गिराकर वे उससे भिड़ गए; दोनों मानो दो गजराज लड़ने लगे। घूँसा मारकर वे वृक्ष पर चढ़ गए; उसे एक क्षण मूर्च्छा आ गई। फिर उठकर उसने बहुत माया रची; पर पवनपुत्र को जीता न जा सका। उसने ब्रह्मास्त्र साधा; कपि ने मन में विचार किया — "यदि मैं ब्रह्म-बाण न मानूँ, तो इसकी अपार महिमा मिट जाएगी।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 19 का अर्थ क्या है?
पुत्र का वध सुनकर लंकेश क्रुद्ध हुआ और बलवान् मेघनाद को भेजा — "हे पुत्र! मारना नहीं, उसे बाँध लाना; देखें यह कपि कहाँ का है।" अतुलनीय योद्धा इंद्रजित चला, भाई के वध से क्रोध उपजा। कपि ने दारुण योद्धा को आते देखा; कटकटाकर गरजे और दौड़े। एक अत्यंत विशाल वृक्ष उखाड़कर लंकेश-कुमार को रथहीन कर दिया; उसके साथ के महाभटों को पकड़-पकड़कर अपने अंगों से मसल डाला। उन्हें गिराकर वे उससे भिड़ गए; दोनों मानो दो गजराज लड़ने लगे। घूँसा मारकर वे वृक्ष पर चढ़ गए; उसे एक क्षण मूर्च्छा आ गई। फिर उठकर उसने बहुत माया रची; पर पवनपुत्र को जीता न जा सका। उसने ब्रह्मास्त्र साधा; कपि ने मन में विचार किया — "यदि मैं ब्रह्म-बाण न मानूँ, तो इसकी अपार महिमा मिट जाएगी।"