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दुर्गा सप्तशती 4.9

अध्याय 4, श्लोक 9

अध्याय 4: Śakrādi Stutiशक्रादिस्तुति

शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान- मुद्गीथरम्यपदपाठवतां साम्नाम् देवि त्रयी भगवती भवभावनाय वार्तासि सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री

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लिप्यंतरण

śabdātmikā suvimalargyajuṣāṃ nidhāna- mudgītharamyapadapāṭhavatāṃ ca sāmnām devi trayī bhagavatī bhavabhāvanāya vārtāsi sarvajagatāṃ paramārtihantrī

अर्थ

आप शब्दात्मिका हैं, अति निर्मल ऋक् और यजुस् (मंत्रों) की निधि हैं, तथा मधुर उद्गीथ-पदपाठ वाले सामवेद की भी; हे देवी! आप त्रयी (तीन वेद), भगवती हैं, समस्त जगत् की जीविका (वार्ता) रूप तथा उनके दुःखों की परम हन्त्री हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 4.9 का अर्थ क्या है?
आप शब्दात्मिका हैं, अति निर्मल ऋक् और यजुस् (मंत्रों) की निधि हैं, तथा मधुर उद्गीथ-पदपाठ वाले सामवेद की भी; हे देवी! आप त्रयी (तीन वेद), भगवती हैं, समस्त जगत् की जीविका (वार्ता) रूप तथा उनके दुःखों की परम हन्त्री हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 9वाँ श्लोक है।