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दुर्गा सप्तशती 4.8

अध्याय 4, श्लोक 8

अध्याय 4: Śakrādi Stutiशक्रादिस्तुति

या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि

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लिप्यंतरण

yā muktiheturavicintyamahāvratā tvaṃ abhyasyase suniyatendriyatattvasāraiḥ mokṣārthibhirmunibhirastasamastadoṣai- rvidyāsi sā bhagavatī paramā hi devi

अर्थ

जो मुक्ति की हेतु और अचिन्त्य महाव्रत स्वरूपा हैं, उन आप का अभ्यास (ध्यान) इन्द्रियों को वश में किए, तत्त्व के सार को जानने वाले, समस्त दोषों से रहित मोक्षार्थी मुनि करते हैं; हे देवी! वही परम विद्या आप भगवती हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 4.8 का अर्थ क्या है?
जो मुक्ति की हेतु और अचिन्त्य महाव्रत स्वरूपा हैं, उन आप का अभ्यास (ध्यान) इन्द्रियों को वश में किए, तत्त्व के सार को जानने वाले, समस्त दोषों से रहित मोक्षार्थी मुनि करते हैं; हे देवी! वही परम विद्या आप भगवती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 8वाँ श्लोक है।