अध्याय 4, श्लोक 7
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतियस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि । स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु- रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥
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लिप्यंतरण
yasyāḥ samastasuratā samudīraṇena tṛptiṃ prayāti sakaleṣu makheṣu devi svāhāsi vai pitṛgaṇasya ca tṛptihetu- ruccāryase tvamata eva janaiḥ svadhā ca
अर्थ
हे देवी! जिनके उच्चारण से समस्त देवता सभी यज्ञों में तृप्ति को प्राप्त होते हैं — आप ही स्वाहा हैं, और पितृगण की तृप्ति का कारण भी; इसीलिए लोग आपको स्वधा भी कहकर उच्चारण करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.7 का अर्थ क्या है?▼
हे देवी! जिनके उच्चारण से समस्त देवता सभी यज्ञों में तृप्ति को प्राप्त होते हैं — आप ही स्वाहा हैं, और पितृगण की तृप्ति का कारण भी; इसीलिए लोग आपको स्वधा भी कहकर उच्चारण करते हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 7वाँ श्लोक है।