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दुर्गा सप्तशती 4.10

अध्याय 4, श्लोक 10

अध्याय 4: Śakrādi Stutiशक्रादिस्तुति

मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा

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लिप्यंतरण

medhāsi devi viditākhilaśāstrasārā durgāsi durgabhavasāgaranaurasaṅgā śrīḥ kaiṭabhārihṛdayaikakṛtādhivāsā gaurī tvameva śaśimaulikṛtapratiṣṭhā

अर्थ

हे देवी! आप मेधा हैं, समस्त शास्त्रों के सार को जानने वाली; आप दुर्गा हैं, दुस्तर भवसागर को पार कराने वाली असंग नौका; आप श्री हैं, जिन्होंने कैटभारि (विष्णु) के हृदय में अपना एकमात्र निवास किया है; आप ही गौरी हैं, जो चन्द्रमौलि (शिव) में प्रतिष्ठित हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 4.10 का अर्थ क्या है?
हे देवी! आप मेधा हैं, समस्त शास्त्रों के सार को जानने वाली; आप दुर्गा हैं, दुस्तर भवसागर को पार कराने वाली असंग नौका; आप श्री हैं, जिन्होंने कैटभारि (विष्णु) के हृदय में अपना एकमात्र निवास किया है; आप ही गौरी हैं, जो चन्द्रमौलि (शिव) में प्रतिष्ठित हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 10वाँ श्लोक है।