अध्याय 4, श्लोक 11
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र- बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् । अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥
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लिप्यंतरण
īṣatsahāsamamalaṃ paripūrṇacandra- bimbānukāri kanakottamakāntikāntam atyadbhutaṃ prahṛtamāttaruṣā tathāpi vaktraṃ vilokya sahasā mahiṣāsureṇa
अर्थ
किंचित् हास्ययुक्त, निर्मल, पूर्ण चन्द्रबिम्ब के समान, उत्तम स्वर्ण की कांति से सुन्दर — ऐसा आपका मुख था; फिर भी यह अत्यंत आश्चर्य है कि महिषासुर ने क्रोध में आकर सहसा उसे देखकर उस पर प्रहार किया!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.11 का अर्थ क्या है?▼
किंचित् हास्ययुक्त, निर्मल, पूर्ण चन्द्रबिम्ब के समान, उत्तम स्वर्ण की कांति से सुन्दर — ऐसा आपका मुख था; फिर भी यह अत्यंत आश्चर्य है कि महिषासुर ने क्रोध में आकर सहसा उसे देखकर उस पर प्रहार किया!
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 11वाँ श्लोक है।