अध्याय 4, श्लोक 12
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिदृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल- मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः । प्राणान् मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥
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लिप्यंतरण
dṛṣṭvā tu devi kupitaṃ bhrukuṭīkarāla- mudyacchaśāṅkasadṛśacchavi yanna sadyaḥ prāṇān mumoca mahiṣastadatīva citraṃ kairjīvyate hi kupitāntakadarśanena
अर्थ
किन्तु हे देवी! क्रुद्ध, भौंहों से विकराल और उदीयमान चन्द्रमा के समान लाल आपके मुख को देखकर भी जो महिष तत्काल प्राण नहीं त्याग बैठा — यह अत्यंत विचित्र है! क्योंकि कुपित यमराज को देखकर भला कौन जीवित रह सकता है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.12 का अर्थ क्या है?▼
किन्तु हे देवी! क्रुद्ध, भौंहों से विकराल और उदीयमान चन्द्रमा के समान लाल आपके मुख को देखकर भी जो महिष तत्काल प्राण नहीं त्याग बैठा — यह अत्यंत विचित्र है! क्योंकि कुपित यमराज को देखकर भला कौन जीवित रह सकता है?
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 12वाँ श्लोक है।