अध्याय 4, श्लोक 34
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिऋषिरुवाच इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथात्मनः । तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥
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लिप्यंतरण
ṛṣiruvāca iti prasāditā devairjagato'rthe tathātmanaḥ tathetyuktvā bhadrakālī babhūvāntarhitā nṛpa
अर्थ
(ऋषि बोले —) हे राजन्! इस प्रकार जगत् और अपने हित के लिए देवताओं द्वारा प्रसन्न की गई भद्रकाली 'ऐसा ही हो' कहकर अन्तर्धान हो गईं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.34 का अर्थ क्या है?▼
(ऋषि बोले —) हे राजन्! इस प्रकार जगत् और अपने हित के लिए देवताओं द्वारा प्रसन्न की गई भद्रकाली 'ऐसा ही हो' कहकर अन्तर्धान हो गईं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 34वाँ श्लोक है।