अध्याय 4, श्लोक 35
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिइत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा । देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥
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लिप्यंतरण
ityetatkathitaṃ bhūpa sambhūtā sā yathā purā devī devaśarīrebhyo jagattrayahitaiṣiṇī
अर्थ
हे राजन्! इस प्रकार यह कह दिया गया कि त्रैलोक्य का हित चाहने वाली देवी पूर्वकाल में देवताओं के शरीरों से किस प्रकार उत्पन्न हुईं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.35 का अर्थ क्या है?▼
हे राजन्! इस प्रकार यह कह दिया गया कि त्रैलोक्य का हित चाहने वाली देवी पूर्वकाल में देवताओं के शरीरों से किस प्रकार उत्पन्न हुईं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 35वाँ श्लोक है।