अध्याय 4, श्लोक 33
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतितस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् । वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥
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लिप्यंतरण
tasya vittarddhivibhavairdhanadārādisampadām vṛddhaye'smatprasannā tvaṃ bhavethāḥ sarvadāmbike
अर्थ
उस पर प्रसन्न होकर आप उसके धन, स्त्री आदि सम्पदाओं की वृद्धि के लिए सदा वरदायिनी रहें, हे अम्बिके।'
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.33 का अर्थ क्या है?▼
उस पर प्रसन्न होकर आप उसके धन, स्त्री आदि सम्पदाओं की वृद्धि के लिए सदा वरदायिनी रहें, हे अम्बिके।'
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 33वाँ श्लोक है।