अध्याय 4, श्लोक 32
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिसंस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः । यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥
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लिप्यंतरण
saṃsmṛtā saṃsmṛtā tvaṃ no hiṃsethāḥ paramāpadaḥ yaśca martyaḥ stavairebhistvāṃ stoṣyatyamalānane
अर्थ
(तो यह कि —) जब-जब हम आपका स्मरण करें, तब-तब आप हमारी महान् विपत्तियों का नाश करें। और हे निर्मल मुख वाली! जो मनुष्य इन स्तुतियों से आपकी स्तुति करेगा,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.32 का अर्थ क्या है?▼
(तो यह कि —) जब-जब हम आपका स्मरण करें, तब-तब आप हमारी महान् विपत्तियों का नाश करें। और हे निर्मल मुख वाली! जो मनुष्य इन स्तुतियों से आपकी स्तुति करेगा,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 32वाँ श्लोक है।