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दुर्गा सप्तशती 4.3

अध्याय 4, श्लोक 3

अध्याय 4: Śakrādi Stutiशक्रादिस्तुति

यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च हि वक्तुमलं बलं सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु

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लिप्यंतरण

yasyāḥ prabhāvamatulaṃ bhagavānananto brahmā haraśca na hi vaktumalaṃ balaṃ ca sā caṇḍikākhilajagatparipālanāya nāśāya cāśubhabhayasya matiṃ karotu

अर्थ

जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् अनन्त (विष्णु), ब्रह्मा और हर (शिव) भी समर्थ नहीं हैं — वे चण्डिका सम्पूर्ण जगत् के पालन और अशुभ के भय के नाश हेतु मन (संकल्प) करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 4.3 का अर्थ क्या है?
जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् अनन्त (विष्णु), ब्रह्मा और हर (शिव) भी समर्थ नहीं हैं — वे चण्डिका सम्पूर्ण जगत् के पालन और अशुभ के भय के नाश हेतु मन (संकल्प) करें।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 3वाँ श्लोक है।