अध्याय 4, श्लोक 4
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिया श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः । श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥
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लिप्यंतरण
yā śrīḥ svayaṃ sukṛtināṃ bhavaneṣvalakṣmīḥ pāpātmanāṃ kṛtadhiyāṃ hṛdayeṣu buddhiḥ śraddhā satāṃ kulajanaprabhavasya lajjā tāṃ tvāṃ natāḥ sma paripālaya devi viśvam
अर्थ
जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं लक्ष्मी (श्री) और पापियों के घरों में अलक्ष्मी हैं, जो विवेकी जनों के हृदय में बुद्धि, सज्जनों में श्रद्धा और कुलीनों में लज्जा हैं — उन्हीं आप को हम प्रणाम करते हैं; हे देवी! विश्व की रक्षा कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.4 का अर्थ क्या है?▼
जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं लक्ष्मी (श्री) और पापियों के घरों में अलक्ष्मी हैं, जो विवेकी जनों के हृदय में बुद्धि, सज्जनों में श्रद्धा और कुलीनों में लज्जा हैं — उन्हीं आप को हम प्रणाम करते हैं; हे देवी! विश्व की रक्षा कीजिए।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 4वाँ श्लोक है।