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दुर्गा सप्तशती 4.2

अध्याय 4, श्लोक 2

अध्याय 4: Śakrādi Stutiशक्रादिस्तुति

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निःशेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः

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लिप्यंतरण

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niḥśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ

अर्थ

'जिन देवी ने अपनी आत्मशक्ति से इस जगत् को व्याप्त किया है, जो समस्त देवगणों की शक्तियों के समूह की मूर्ति हैं, और जो समस्त देवों व महर्षियों द्वारा पूज्य हैं — उन अम्बिका को हम भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं; वे हमारा कल्याण करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 4.2 का अर्थ क्या है?
'जिन देवी ने अपनी आत्मशक्ति से इस जगत् को व्याप्त किया है, जो समस्त देवगणों की शक्तियों के समूह की मूर्ति हैं, और जो समस्त देवों व महर्षियों द्वारा पूज्य हैं — उन अम्बिका को हम भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं; वे हमारा कल्याण करें।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 2वाँ श्लोक है।