अध्याय 4, श्लोक 1
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिॐ ऋषिरुवाच शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या । तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥
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लिप्यंतरण
oṃ ṛṣiruvāca śakrādayaḥ suragaṇā nihate'tivīrye tasmindurātmani surāribale ca devyā tāṃ tuṣṭuvuḥ praṇatinamraśirodharāṃsā vāgbhiḥ praharṣapulakodgamacārudehāḥ
अर्थ
(ॐ। ऋषि बोले —) जब वह महापराक्रमी दुरात्मा (महिषासुर) और देवशत्रुओं की सेना देवी द्वारा नष्ट हो गई, तब इन्द्रादि देवगण — प्रणाम से झुके सिर, कंधे व गर्दन वाले, हर्ष के रोमांच से सुशोभित शरीर वाले — इन वचनों से उनकी स्तुति करने लगे:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.1 का अर्थ क्या है?▼
(ॐ। ऋषि बोले —) जब वह महापराक्रमी दुरात्मा (महिषासुर) और देवशत्रुओं की सेना देवी द्वारा नष्ट हो गई, तब इन्द्रादि देवगण — प्रणाम से झुके सिर, कंधे व गर्दन वाले, हर्ष के रोमांच से सुशोभित शरीर वाले — इन वचनों से उनकी स्तुति करने लगे:
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 1वाँ श्लोक है।