अध्याय 4, श्लोक 27
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिऋषिरुवाच एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः । अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥
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लिप्यंतरण
ṛṣiruvāca evaṃ stutā surairdivyaiḥ kusumairnandanodbhavaiḥ arcitā jagatāṃ dhātrī tathā gandhānulepanaiḥ
अर्थ
(ऋषि बोले —) इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति की गई, और नंदनवन में उत्पन्न दिव्य पुष्पों तथा सुगन्धित अनुलेपनों से पूजित जगत्-धात्री देवी,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.27 का अर्थ क्या है?▼
(ऋषि बोले —) इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति की गई, और नंदनवन में उत्पन्न दिव्य पुष्पों तथा सुगन्धित अनुलेपनों से पूजित जगत्-धात्री देवी,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 27वाँ श्लोक है।