अध्याय 4, श्लोक 20
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिदुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः । वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥
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लिप्यंतरण
durvṛttavṛttaśamanaṃ tava devi śīlaṃ rūpaṃ tathaitadavicintyamatulyamanyaiḥ vīryaṃ ca hantṛ hṛtadevaparākramāṇāṃ vairiṣvapi prakaṭitaiva dayā tvayettham
अर्थ
हे देवी! आपका स्वभाव दुष्टों के आचरण का शमन करना है; आपका यह रूप अचिन्त्य और दूसरों से अतुलनीय है; आपका पराक्रम देवों के बल को छीनने वालों का संहारक है — और इस प्रकार आपने शत्रुओं पर भी दया प्रकट की है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.20 का अर्थ क्या है?▼
हे देवी! आपका स्वभाव दुष्टों के आचरण का शमन करना है; आपका यह रूप अचिन्त्य और दूसरों से अतुलनीय है; आपका पराक्रम देवों के बल को छीनने वालों का संहारक है — और इस प्रकार आपने शत्रुओं पर भी दया प्रकट की है।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 20वाँ श्लोक है।