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दुर्गा सप्तशती 4.21

अध्याय 4, श्लोक 21

अध्याय 4: Śakrādi Stutiशक्रादिस्तुति

केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि

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लिप्यंतरण

kenopamā bhavatu te'sya parākramasya rūpaṃ ca śatrubhayakāryatihāri kutra citte kṛpā samaraniṣṭhuratā ca dṛṣṭā tvayyeva devi varade bhuvanatraye'pi

अर्थ

आपके इस पराक्रम की उपमा किससे दी जाए? और शत्रुओं में भय उत्पन्न करने वाला फिर भी इतना मनोहर रूप कहाँ मिलेगा? हे वरदायिनी देवी! हृदय में कृपा और युद्ध में निष्ठुरता — दोनों तीनों लोकों में केवल आप में ही देखी जाती हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 4.21 का अर्थ क्या है?
आपके इस पराक्रम की उपमा किससे दी जाए? और शत्रुओं में भय उत्पन्न करने वाला फिर भी इतना मनोहर रूप कहाँ मिलेगा? हे वरदायिनी देवी! हृदय में कृपा और युद्ध में निष्ठुरता — दोनों तीनों लोकों में केवल आप में ही देखी जाती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 21वाँ श्लोक है।