अध्याय 4, श्लोक 18
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिदृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान्प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वहितेषुसाध्वी ॥
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लिप्यंतरण
dṛṣṭvaiva kiṃ na bhavatī prakaroti bhasma sarvāsurānariṣu yatprahiṇoṣi śastram lokānprayāntu ripavo'pi hi śastrapūtā itthaṃ matirbhavati teṣvahiteṣusādhvī
अर्थ
क्या आप दृष्टिमात्र से ही समस्त असुरों को भस्म नहीं कर देतीं? फिर भी आप शत्रुओं पर शस्त्र इसलिए चलाती हैं कि शस्त्र से पवित्र होकर वे शत्रु भी उत्तम लोकों को जाएँ — शत्रुओं के प्रति भी आपकी ऐसी मंगलमयी बुद्धि है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.18 का अर्थ क्या है?▼
क्या आप दृष्टिमात्र से ही समस्त असुरों को भस्म नहीं कर देतीं? फिर भी आप शत्रुओं पर शस्त्र इसलिए चलाती हैं कि शस्त्र से पवित्र होकर वे शत्रु भी उत्तम लोकों को जाएँ — शत्रुओं के प्रति भी आपकी ऐसी मंगलमयी बुद्धि है।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 18वाँ श्लोक है।