अध्याय 4, श्लोक 17
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिएभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । सङ्ग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नूनमहितान्विनिहंसि देवि ॥
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लिप्यंतरण
ebhirhatairjagadupaiti sukhaṃ tathaite kurvantu nāma narakāya cirāya pāpam saṅgrāmamṛtyumadhigamya divaṃ prayāntu matveti nūnamahitānvinihaṃsi devi
अर्थ
इनके मारे जाने से जगत् सुख पाता है; और यद्यपि इन्होंने दीर्घकाल तक नरक के योग्य पाप किए हैं, फिर भी (आप सोचती हैं) 'ये संग्राम में मृत्यु पाकर स्वर्ग को जाएँ' — हे देवी! ऐसा मानकर ही निश्चय आप शत्रुओं का वध करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.17 का अर्थ क्या है?▼
इनके मारे जाने से जगत् सुख पाता है; और यद्यपि इन्होंने दीर्घकाल तक नरक के योग्य पाप किए हैं, फिर भी (आप सोचती हैं) 'ये संग्राम में मृत्यु पाकर स्वर्ग को जाएँ' — हे देवी! ऐसा मानकर ही निश्चय आप शत्रुओं का वध करती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 17वाँ श्लोक है।