अध्याय 4, श्लोक 15
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिधर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा- ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति । स्वर्गं प्रयाति च ततो भवती प्रसादा- ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥
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लिप्यंतरण
dharmyāṇi devi sakalāni sadaiva karmā- ṇyatyādṛtaḥ pratidinaṃ sukṛtī karoti svargaṃ prayāti ca tato bhavatī prasādā- llokatraye'pi phaladā nanu devi tena
अर्थ
हे देवी! आपकी कृपा से पुण्यात्मा पुरुष प्रतिदिन अत्यंत आदर से समस्त धर्म-कर्म करता है, और उससे स्वर्ग को जाता है; इस प्रकार हे देवी! क्या आप तीनों लोकों में फलदात्री नहीं हैं?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.15 का अर्थ क्या है?▼
हे देवी! आपकी कृपा से पुण्यात्मा पुरुष प्रतिदिन अत्यंत आदर से समस्त धर्म-कर्म करता है, और उससे स्वर्ग को जाता है; इस प्रकार हे देवी! क्या आप तीनों लोकों में फलदात्री नहीं हैं?
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 15वाँ श्लोक है।