अध्याय 4, श्लोक 14
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति बन्धुवर्गः । धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥
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लिप्यंतरण
te sammatā janapadeṣu dhanāni teṣāṃ teṣāṃ yaśāṃsi na ca sīdati bandhuvargaḥ dhanyāsta eva nibhṛtātmajabhṛtyadārā yeṣāṃ sadābhyudayadā bhavatī prasannā
अर्थ
जिन पर आप सदा अभ्युदय देने वाली प्रसन्न रहती हैं, वे जनपदों में सम्मानित होते हैं, उन्हीं के धन और यश होते हैं, उनका बन्धु-वर्ग दुःखी नहीं होता; वे ही धन्य हैं जिनके पुत्र, सेवक और स्त्रियाँ विनीत रहते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.14 का अर्थ क्या है?▼
जिन पर आप सदा अभ्युदय देने वाली प्रसन्न रहती हैं, वे जनपदों में सम्मानित होते हैं, उन्हीं के धन और यश होते हैं, उनका बन्धु-वर्ग दुःखी नहीं होता; वे ही धन्य हैं जिनके पुत्र, सेवक और स्त्रियाँ विनीत रहते हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 14वाँ श्लोक है।