अध्याय 11, श्लोक 49
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतितदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासङ्ख्येयषट्पदम् । त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥
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लिप्यंतरण
tadāhaṃ bhrāmaraṃ rūpaṃ kṛtvāsaṅkhyeyaṣaṭpadam trailokyasya hitārthāya vadhiṣyāmi mahāsuram
अर्थ
तब मैं असंख्य भ्रमरों (मधुमक्खियों) का रूप धारण करके त्रैलोक्य के हित के लिए उस महान् असुर का वध करूँगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.49 का अर्थ क्या है?▼
तब मैं असंख्य भ्रमरों (मधुमक्खियों) का रूप धारण करके त्रैलोक्य के हित के लिए उस महान् असुर का वध करूँगी।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 49वाँ श्लोक है।