अध्याय 11, श्लोक 45
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिशाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि । तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ॥
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लिप्यंतरण
śākambharīti vikhyātiṃ tadā yāsyāmyahaṃ bhuvi tatraiva ca vadhiṣyāmi durgamākhyaṃ mahāsuram
अर्थ
तब मैं पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात होऊँगी; और वहीं दुर्गम नामक महान् असुर का वध करूँगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.45 का अर्थ क्या है?▼
तब मैं पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात होऊँगी; और वहीं दुर्गम नामक महान् असुर का वध करूँगी।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 45वाँ श्लोक है।