अध्याय 11, श्लोक 35
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिदेव्युवाच वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ । तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥
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लिप्यंतरण
devyuvāca varadāhaṃ suragaṇā varaṃ yanmanasecchatha taṃ vṛṇudhvaṃ prayacchāmi jagatāmupakārakam
अर्थ
(देवी बोलीं —) 'हे देवगण! मैं वरदायिनी हूँ। मन से जो वर चाहते हो, वही माँग लो; जगत् का उपकार करने वाला वह वर मैं प्रदान करती हूँ।'
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.35 का अर्थ क्या है?▼
(देवी बोलीं —) 'हे देवगण! मैं वरदायिनी हूँ। मन से जो वर चाहते हो, वही माँग लो; जगत् का उपकार करने वाला वह वर मैं प्रदान करती हूँ।'
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 35वाँ श्लोक है।