अध्याय 11, श्लोक 34
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिप्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥
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लिप्यंतरण
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava
अर्थ
हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम प्रणत जनों पर प्रसन्न होइए; हे त्रैलोक्य-निवासियों द्वारा वन्दनीय! लोकों को वर देने वाली बनिए!'
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.34 का अर्थ क्या है?▼
हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम प्रणत जनों पर प्रसन्न होइए; हे त्रैलोक्य-निवासियों द्वारा वन्दनीय! लोकों को वर देने वाली बनिए!'
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 34वाँ श्लोक है।