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दुर्गा सप्तशती 11.33

अध्याय 11, श्लोक 33

अध्याय 11: Nārāyaṇī Stutiनारायणीस्तुति

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्

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लिप्यंतरण

devi prasīda paripālaya no'ribhīte- rnityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān

अर्थ

हे देवी! प्रसन्न होइए; जैसे अभी असुर-वध से आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा हमें शत्रु-भय से बचाइए। और समस्त जगत् के पापों तथा उत्पातों से उत्पन्न महान् उपसर्गों को शीघ्र शान्त कीजिए।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 11.33 का अर्थ क्या है?
हे देवी! प्रसन्न होइए; जैसे अभी असुर-वध से आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा हमें शत्रु-भय से बचाइए। और समस्त जगत् के पापों तथा उत्पातों से उत्पन्न महान् उपसर्गों को शीघ्र शान्त कीजिए।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 33वाँ श्लोक है।