अध्याय 11, श्लोक 32
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिविश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीह विश्वम् । विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥
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लिप्यंतरण
viśveśvari tvaṃ paripāsi viśvaṃ viśvātmikā dhārayasīha viśvam viśveśavandyā bhavatī bhavanti viśvāśrayā ye tvayi bhaktinamrāḥ
अर्थ
हे विश्वेश्वरी! आप विश्व की रक्षा करती हैं; विश्वात्मिका होकर आप ही यहाँ विश्व को धारण करती हैं; आप विश्व के स्वामियों द्वारा भी वन्दनीय हैं; और जो भक्ति से आपके आगे नम्र होते हैं, वे विश्व के आश्रय बन जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.32 का अर्थ क्या है?▼
हे विश्वेश्वरी! आप विश्व की रक्षा करती हैं; विश्वात्मिका होकर आप ही यहाँ विश्व को धारण करती हैं; आप विश्व के स्वामियों द्वारा भी वन्दनीय हैं; और जो भक्ति से आपके आगे नम्र होते हैं, वे विश्व के आश्रय बन जाते हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 32वाँ श्लोक है।